बेरोजगारी(Unemployment)क्या है?बेरोजगारी के प्रकार, कारण,परिणाम

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बेरोजगारी(Berojgari)

बेरोजगारी की परिभाषा (Definition of Unemployment)-

जब एक व्यक्ति सक्रियता से रोजगार की तलाश करता है लेकिन वह काम पाने में असफल रहता है तो इस अवस्था को बेरोजगारी( unemployment ) कहा जाता है! समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण “यह सामान्य कार्यरत बल के एक सदस्य को सामान्य कार्यकाल में सामान्य वेतन पर और उसकी इच्छा के विरुद्ध वैतनिक कार्य से अलग रखना है!”

बेरोजगारी के प्रकार (Types of unemployment) – 

(1) प्रकट बेरोजगारी (Manifest Unemployment)- 

यदि कोई व्यक्ति किसी उत्पादक कार्य में शामिल हीं न हो तो उस स्थिति को प्रकट बेरोजगारी कहते हैं या यदि कोई व्यक्ति किसी उत्पादक कार्य से अलग-थलग हो तो उसे प्रकट बेरोजगारी कहते हैं! 

(2) प्रच्छन्न बेरोजगारी(Disguised Unemployment) –

जब किसी काम में जरूरत से ज्यादा व्यक्ति शामिल रहते हैं, जबकि उतने लोगों की जरूरत नहीं होती तो यह स्थिति प्रच्छन्न बेरोजगारी कहलाती है! 
प्रच्छन्न बेरोजगारी कृषि क्षेत्र में अधिक देखने को मिलती है क्योंकि जनसंख्या एवं खेतों का उपविभाजन पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ता जाता है!  साथ ही गैर कृषि रोजगारों की संख्या पर्याप्त रूप से नहीं बढती है! 

(3) संरचनात्मक बेरोजगारी(structural Unemployment) – 

यदि देश के उत्पादक संस्थाओं की संख्या में कमी, तकनीकी परिवर्तन आदि के कारण रोजगार के अवसर सीमित रह जाते हों और श्रमशक्ति का एक बड़ा वर्ग बेरोजगार हो जाता है वह भी समस्या का समाधान गिरधारी कहा जाता है! 

(4) चक्रीय बेरोजगारी(Cyclical Unemployment) – 

उत्पादक संस्थाओं में समायोजन के दौरान अथवा परिवेश में परिवर्तन के दौरान रोजगार की संख्या में होने वाली अल्पकालिक गिरावट के फलस्वरूप उत्पन्न ने बेरोजगारी को चक्रीय बेरोजगारी कहते हैं! 

(5) ऐच्छिक बेरोजगारी(Voluntary Unemployment) – 

जब लोग वर्तमान वेतन दर पर काम करने के लिए तैयार नहीं होते हैं हैं और उन्हें अपनी संपत्ति या अन्य स्रोतों से निरंतर आमदनी होती रहती है जिसके कारण उन्हें काम की जरूरत महसूस नहीं होती है, इस स्थिति को ऐच्छिक बेरोजगारी कहा जाता है! 

(6) अनैच्छिक बेरोजगारी(Involuntary Unemployment) – 

जब जब कोई व्यक्ति प्रचलित दर पर काम करने की इच्छा रखता हो किंतु कार्य की उपलब्धता न हो तो इस स्थिति को अनैच्छिक बेरोजगारी कहा जाता है! 

(7) मौसमी बेरोजगारी (Seasonal Unemployment) – 

जब हम नियोजित व्यक्ति की बात करते हैं तो हमारा तात्पर्य उन लोगों से होता है जो वर्षभर काम करते हैं! कृषि जैसे क्षेत्र में काम मौसमी होता है लेकिन कृषि संबंधी गतिविधियां वर्षभर चलती रहती है, जैसे-फसल कटाई के समय, बीज बोने, फसल उगाने, निराई करते समय काम करने के लिए लोग के लिए ज्यादा लोगों की आवश्यकता होती है इस कारण से समय रोजगार बढ़ जाता है! एक बार जब ये काम खत्म हो जाते हैं तो क्षेत्र से जुड़े हुए कामगर  विशेषकर भूमिहीन बेरोजगार हो जाते हैं! इस प्रकार की बेरोजगारी कहते हैं! 

Unemployment

बेरोजगारी के कारण (unemployment) –

(1) विकास की धीमी गति –

बेरोजगारी का मुख्य कारण वृद्धि की धीमी गति है! रोजगार का आकार प्रायः बहुत सीमा तक, विकास के स्तर पर निर्भर करता है! आयोजन काल के दौरान हमारे देश ने सभी क्षेत्रों में बहुत उन्नति की है! परंतु वृद्धि की दर, लक्ष्य दर की तुलना में बहुत नीची है! 

(2) पिछड़ी हुई कृषि –  

कृषि की विधियां एवं तकनीकी पुरानी तथा खर्चीली हो चुकी है, जिससें उत्पादन की में कमी आई है तथा किसानों की आय में कमी आई है! किसान रोजगार के नए साधन ढूंढ रहे हैं क्योंकि कृषि उनका पालन पोषण नहीं कर पा रही हैं! 

(3) त्रुटिपूर्ण शिक्षा प्रणाली – 

हमारे देश में शिक्षा प्रणाली भी वर्तमान अंतर-पीढ़ी अंतराल के लिए कार्य करने में असफल रही है! यह वही प्राचीन प्रणाली है जिसे मैकाले ने उपनिवेश काल में प्रारंभ किया था! यह केवल साधारण एवं साहित्यिक शिक्षा प्रदान करती है तथा प्रयोगिक विषयवस्तु रहित है! 

(4) जनसंख्या वृद्धि – 

भारत की जनसंख्या निरंतर बढ़ रही है जिससे रोजगार की स्थिति दो प्रकार से विपरीत रूप में प्रभावित हुई, पहले तो श्रम शक्ति की संख्या का बढ़ना और दूसरा पूंजी निर्माण के लिए साधनों का कम होना! 

(5) कुटीर एवं लघु उद्योग का हास – 

परंपरावादी हस्तकला का अतीत बहुत उज्जवल था परंतु दुर्भाग्य से गांव की अधिकांश हस्तकला समाप्त हो गई है अथवा क्षीण हो गई है! इसका कारण एक तो विदेशी प्रशासकों की अहितकर नीति थी ,दूसरा इन्हें मशीनों द्वारा निर्मित वस्तुओं द्वारा प्रस्तुत कड़ी प्रतियोगिता का सामना करना पड़ा! परिणामस्वरूप इन श्रमिकों को रोजगार समाप्त हो गया! 

बेरोजगारी को दूर करने के उपाय (unemployment Ko Dur Karne Ke Upay) – 

(1) श्रमगहन तकनीकों का अपनाना – 

हमारी सरकार को चाहिए कि उत्पादन के नए क्षेत्रों के लिए श्रम-गहन तकनीक को अपनाना जाए! शुम्पीटर में भी इसे मध्यस्थ प्रौद्योगिकी नाम दिया है जो बड़े स्तर पर अधिक श्रम के समावेशन के लिए वास्तव में लाभप्रद है! 

(2) तीव्र औद्योगिकरण – 

औद्योगिक बेरोजगारी की समस्या के समाधान के लिए औपचारिक औद्योगिक दक्षता को पढ़ाने में नहीं थे इसका अर्थ है कि वर्तमान उद्योगों के विस्तार तथा नए उद्योगों का विकास की बहुत आवश्यकता है! 

(3) जनसंख्या नियंत्रण – 

जनसंख्या वृद्धि को रोकने बिना बेरोजगारी की समस्या का समाधान संभव नहीं है! कृषि और औद्योगिक उत्पादन को बढ़ाने के लिए सभी प्रयत्न व्यर्थ होंगे क्योंकि बढ़ती हुई जनसंख्या बढ़े हुए उत्पादन को निकल जाएगी. इसलिए परिवार नियोजन के कार्यक्रम को विशेषतया ग्रामीण एवं पिछड़े क्षेत्रों में सफल बनाने के लिए विशेष प्रचार की आवश्यकता है! 

(4) शिक्षा प्रणाली में सुधार –

शहरी क्षेत्र में पढ़े-लिखे बेरोजगार लोगों की समस्या के संबंध में, भारत के लिए आवश्यक है कि देश के बदलते वातावरण के अनुसार शिक्षा प्रणाली को सुधारों सहित पुनः निर्मित किया जाये! शिक्षा का व्यवसायीकरण आवश्यक है! युवा व्यक्तियों को उपयुक्त शिक्षा उपलब्ध की जाए तो विशेषता गांवों में अपनी पसंद के लघु एवं कुटीर उद्योग को आरंभ कर सकें! 

(5) छोटे उद्यमों को प्रोत्साहन –

स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध करने के लिए लघु स्तरीय उद्योगों को उच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए! उन्हें उदार ऋण, तकनीकी प्रशिक्षण, कच्चे माल और संरचना की सुविधाएं तथा विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध की जानी चाहिए! 

बेरोजगारी के परिणाम(Unemployment Ke Parinam – 

(1) बेरोजगार व्यक्ति का मोह भंग हो जाता है और उसमें सनकपन जाता है! 

(2) बेरोजगारी के कारण परिवार विघटित हो जाते हैं! 

(3) बेरोजगारी जो व्यक्तिक विघटन एवं पारिवारिक विघटन की जन्मतिथि सामाजिक विघटन का भी आधारशिला होती है!

 (4) बेरोजगारी के कारण व्यक्ति सामुदायिक जीवन में भाग लेना बंद कर देता है! बेरोजगार व्यक्ति तनावग्रस्त रहने लगता है तथा कभी-कभी समाज में क्रांति के बीज बोने की कोशिश करता है! 

(5) बेरोजगारी आतंकवाद को बढ़ावा देती है! बेरोजगार व्यक्ति अपनी वर्तमान स्थिति के लिए समाज के प्रति, सरकार के प्रति क्रोधित होते हैं! 

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