संप्रभुता(Samprabhuta)क्या है? संप्रभुता का अर्थ, परिभाषा, प्रकार, लक्षण

संप्रभुता (Samprabhuta) -

संप्रभुता (Samprabhuta) –

संप्रभुता को अंग्रेजी में Sovereignty कहते हैं. Sovereignty शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के शब्द Superanus से हुई है, जिसका अर्थ होता है – सर्वोच्च सत्ता! 
 
संप्रभुता शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग फ्रांसीसी विचारक बोंदा ने अपनी पुस्तक The Six Books of The Republic में किया. इस प्रकार संप्रभुता शब्द 16 वीं शताब्दी में अस्तित्व में आया! 
 

संप्रभुता क्या है(Samprabhuta Kya he )  – 

संप्रभुता शब्द का अर्थ है कि कोई देश अपने आंतरिक और बाहरी मामलों में पूर्ण रुप से स्वतंत्र है और किसी विदेशी सत्ता के अधीन नहीं है! वह देश अपनी नीतियों को बनाने तथा उन्हें लागू करने में पूरी तरह से स्वतंत्र हैं! किसी दूसरे देश के उसके आंतरिक है तथा बाहरी मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं है! 
 

संप्रभुता की परिभाषा ( Samprabhuta ki Paribhaasha) – 

गैटिल – संप्रभुता ही राज्य का वह लक्षण है जो इसे अन्य समुदायों से अलग करता है! 
 
लास्की – संप्रभुता के कारण ही राज्य अन्य मानव समुदायों से भिन्न है! 
 
बोंदो – संप्रभुता  नागरिक और प्रजा के ऊपर सर्वोच्च शक्ती है और कानून इसे नियंत्रित नहीं कर सकता ! 
विलोबी –“संप्रभुता राज्य की सर्वोच्च इच्छा है”
 
डैविड हैल्ड – संप्रभुता का अर्थ समुदाय के अंदर प्राधिकार जिसके पास एक प्रदत क्षेत्र के भीतर नियम, विनिमय और  नियम निर्धारण के लिए अविवादित अधिकार होता है! 
 

संप्रभुता के प्रकार ( Types of Samprabhuta) –

संप्रभुता मुख्य दो प्रकार की होती है –

(1) आंतरिक संप्रभुता (Internal samprabhuta ) –

संप्रभुता राज्य की सर्वोच्च शक्ति है जिस की आज्ञा का पालन राज्य की सीमा क्षेत्र के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति करता है! 
 

(2) बाहय संप्रभुता ( External samprabhuta ) –

राज्य की सीमा के बाहर किसी दूसरे की सत्ता से मुक्त होना अर्थात राज्य की स्वतंत्रता! राज्य किसी दूसरी शक्ति के इच्छा के अधीन न हो तथा दूसरे सत्ता के आदेशों का पालन करने के लिए बाध्य न हो! 
 

संप्रभुता के लक्षण –

संप्रभुता के प्रमुख लक्षण इस प्रकार है –
 
(1) मौलिकता (2) निरकुंशता (3) सार्वभौमिकता (4)  स्थायित्व (5) पृथक्करणीय (6) अविभाज्यता
(7) अनन्यता ! 
 

संप्रभुता के प्रकार ( Types of samprabhuta )

संप्रभुता निम्न प्रकार की होती है नाममत्र, 
वास्तविक, कानूनी, राजनीतिक, वेद्य, यथार्थ, जन आदि! 
 

ऑस्टिन का संप्रभुता सिद्धांत – 

संप्रभुता संबंधी विचार 1832 में प्रकाशित पुस्तक Lecture of Jurisprudence में दिए ! ऑस्टिन, हाफ तथा बेंथम के विचारों से प्रभावित थे. वह परंपरा पर कानूनों की श्रेष्ठता स्थापित करना चाहते थे! 
 

परिभाषा –

यदि कोई निश्चित मानव श्रेष्ठ जो स्वयं के समान किसी श्रेष्ठ के आदेश का पालन करने का अभ्यस्त ना हो और समाज के एक बड़े भाग से स्थाई रूप से अपने आदेशों का पालन कराने में समर्थ हो तो, वह निश्चित श्रेष्ठ व्यक्ति संप्रभु होता है. और वह समाज जिसमें वह संप्रभु भी सम्मिलित है एक राजनीतिक तथा स्वाधीन समाज (अथवा राज्य) होता है! 
 

विशेषताएं – 

(1) संप्रभुता राज्य के लिए आवश्यक है! संप्रभुता राज्य के चारों मूल घटकों में से एक घटक है! यदि राज्य निकाय है तो संप्रभुता उसकी आत्मा है! 
 
(2) संप्रभुता का निश्चित होना आवश्यक है! यह किसी व्यक्ति अथवा व्यक्तियों के निकाय में सन्निहित होती है! 
 
(3) संप्रभुता राज्य में सर्वोच्च शक्ति होती है राज्य के सभी प्राधिकार उसी से प्राप्त होतें है! 
 
(4) संप्रभुता जनता से स्वाभाविक निष्ठा प्राप्त करती है इस प्रकार संप्रभुता का प्राधिकार आकस्मिक नहीं है! 
 
(5) कानून संप्रभुता की इच्छा और आदेश है! संप्रभुता समाज की परंपराओं और रीति-रिवाजों से ऊपर होती है! 
 
(6) संप्रभुता में आदेश और निष्ठा प्राप्त करने की कानून सम्मत वास्तविक सकती है और यह अपने कानूनों को लव करती है! 
 
(7) संप्रभुता की शक्ति अनन्य और अखंड है यह स्वयमेव ऐसी इकाई है जिसे दो या दो से अधिक व्यक्तियों में विभाजित नहीं किया जा सकता है! 
 

आलोचना –

ऑस्टिन का संप्रभुता सिद्धांत की निम्न आधार पर आलोचना की जाती है-
(1) निश्चित व्यक्ति की अवधारणा भ्रामक है! 
 
(2) लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुकूल नहीं है, क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में शक्तियों का विकेंद्रीकरण होता है! 
 
(3) कानूनी संबंधी विचार भ्रामक है, क्योंकि डिग्बी के अनुसार राज्य कानून का निर्माण नहीं करता, बल्कि कानून ही राज्य का निर्माण करते हैं! 
 
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