प्रवाल भित्ति क्या हैै? प्रवाल भित्ति के प्रकार, उत्पति, महत्व (praval bhitti)

प्रवाल भित्ति क्या हैै (praval bhitti kya hai) –

प्रवाल चुना प्रधान जीव है। प्रवाल मुख्यत: कठोर रचना वाले खोल होते हैं जिनमें मुलायम जीव रहते हैं। यह बड़े होकर तटो के सहारे छिछले चबूतरो पर विकसित होते रहते हैं। प्रवाल विशेष प्रकार के रंगों वाले होते हैं। जब कोई प्रवाल मरता है तो दूसरा उसी के शरीर पर कड़ी के रूप में विकसित हो जाता है इसकी आकृति टहनियों की तरह अथवा शाखाओं की तरह हो जाती है। इस प्रकार प्रवाल जीव मरने के उपरांत एक विशिष्ट प्रकार की शाखाओं की रचना करते हैं जो दीवार की भांति होती है इस दीवार की भांति रचना को ही प्रवाल भित्ति (praval bhitti) कहते हैं। 

प्रवाल भित्ति के प्रकार (praval bhitti ke prakar) –

प्रवाल भित्तियो को उनकी आकृति एवं क्षेत्र विस्तार के आधार पर निम्नलिखित भागों में बांटा जा सकता है। 

(1) अनुतट या तटीय प्रवाल भित्ति (tatiya praval bhitti) –

तटीय, तटवर्ती या अनुतट प्रवाल भित्ति महाद्वीपों के पूर्वी तट की ओर एवं दीपों के किनारों के निकट या सहारे-सहारे विकसित होती है। पी.लेक के अनुसार,” प्रवाल भित्ति जो किसी द्वीप अथवा महाद्वीप के तट के साथ बनी होती है, अर्थात तट से सलग्न होती है, तब उसे अनु तटीय प्रवाल भित्ति कहते हैं।

“इसकी रचना निमग्न तट या छीछले सागर के चबूतरे से प्रारंभ होती है। इनका विकास समुद्र के छीछले तल या चबूतरे पर तट के निकट ही होता है। यह फ्लोरिडा के तट, अंडमान निकोबार एवं लक्षद्वीप समूह, पूर्वी मलेशिया प्रायद्वीप एवं मध्यवर्ती प्रशांत द्वीपों पर अधिक विकसित रूप में पाई जाती है। 

(2) परातट या अवरोधक प्रवाल भित्ति (avrodhak praval bhitti) –

ऐसी प्रवाल भित्ति महाद्वीपों एवं दीपों के तट से कुछ किलोमीटर दूरी पर तट के समानांतर विकसित होती है चूंकि ऐसी प्रवाल भित्ति तट एवं खुले सागर के मध्य सीधे संपर्क में एवं यातायात में अवरोध पैदा करती है इसलिए इसे परातट या अवरोधक प्रवाल भित्ति कहते हैं। ऐसी प्रवाल में तट एवं प्रवाल भित्ति के मध्य सकरी किंतु छिछली नहर, खाड़ी या चैनल बन जाती है।

यह आकार में लंबी, अधिक चौड़ी व कम गहरी होती है। मध्यवर्ती चैनल में भी धीरे-धीरे मूंगे व अन्य जीवों एवं  अवसादों का जमाव होते रहने से यह छिछली होती जाती है अतः इसमें स्टीमर या जहाज नहीं आ जा सकते हैं ऐसी प्रवालियो का विकास कई स्थान पर 100 मीटर या उससे भी अधिक गहराई में भी हुआ है पूर्वी आस्ट्रेलिया की महान और अवरोधक प्रवाल भित्ति इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।  

(3) वलयाकार प्रवाल भित्ति (valyakar praval bhitti) –

वलयाकार प्रवाल भित्ति एक अंगूठी अथवा घोड़े के नाल की आकृति में होती है, जिसके केंद्र में लैगून होता है। इस प्रकार की प्रवाल भित्तिका विकास दीपों के चारों और घोड़े के नाल की भांति होता है। जब किसी द्वीपों के अधिकांश भाग में परातट और अवरोधक प्रवाली फैल जाती है तो इसकी आकृति वलयाकार हो जाती है।

महाद्वीपीय निमग्न तट या महासागरों के चबूतरे पर जो उभार पाए जाते हैं, उनके चारों और अनेक बार घोड़े के नाल की भांति रचना का विकास होने लगता है। इस वलयाकार प्रवाली के मध्य झील या लैगुन होती है। लैगुन की गहराई 30 से 60 मीटर तक की हो सकती है ।ऐसी वलयाकार प्रवाल भित्ति लाल सागर, एण्टीलिस सागर, चीन सागर, इंडोनेशिया सागर आदि में अनेक स्थानों पर पाई जाती है 

(4) प्रवाल दीप (praval dweep) –

प्रवाल दीप वोल्वो कार प्रवाल भित्ति का ही विकसित रूप है यह दो प्रकार से विकसित होता है –

(1) जब किसी दीप के चारों ओर वलयाकार प्रणाली विकसित होती है तो मध्य में द्वीप होने एवं लैगुन छीछली रहने से उसे प्रवाल दीप कह सकते हैं।

(2) जब वलयाकार प्रवाल भित्ति के मध्य छिछली लैगुन होती है तो वह धीरे-धीरे बालू, प्रवाल भित्ति टुकड़ों आदि में भरती जाती है। इससे वहां नवीन द्वीप बनता जाता है। यहां पक्षियों या पवन के माध्यम से वनस्पति के बीज आ जाते हैं एवं जहां धीरे-धीरे हरियाली भी पैदा होने लगती है इनकी सागर तल से बहुत कम ऊंचाई होती है।

अतः लहरें उठने पर सारा दीप जल से ढक जाता है। इस प्रकार के प्रवाल दीप निकोबार दीप समूह पूर्वी ऑस्ट्रेलिया महान अवरोधक प्रवाल भित्ति के पूर्व में पाए जाते हैं। 

स्थिति के आधार पर प्रवाल भित्ति या दो प्रकार की होती है 

(1) उष्णकटिबंधीय प्रवाल भित्तियाॅ (usankatiband praval bhitti) –

उष्णकटिबंधीय प्रवाल भितियों का अक्षांशीय विस्तार 25° उत्तरी अक्षांश से 25° दक्षिणी अक्षांश तक फैला हुआ है। इन अक्षांशों में प्रवाल भित्ति के विकास की आवश्यक भौतिक दशाएं आसानी से मिल जाती है प्रशांत,अटलांटिक तथा हिंद महासागर में महादीपो के निकट तथा अन्य छोटे छोटे द्वीपों के पास प्रवाल भित्ति अधिक पाई जाती है।

यहां भी महाद्वीपों के पूर्वी भाग में प्रवाल जीव अपनी भित्तियो को बनाने में अधिक सफल होते हैं। उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका तथा आस्ट्रेलिया महाद्वीपों के पश्चिमी भाग में प्रायः ठंडी धाराएं बहती है। ठंडी धाराओं के कारण प्रवाल विकसित नहीं हो पाते। इसके विपरीत, महाद्वीपों के पूर्वी तट के निकट गर्म धाराओं के बहने से एवं अनुकूल भौगोलिक दशाओं के कारण यहां प्रवाल निरंतर बढ़ते रहते हैं।

(2) सीमांत प्रदेशीय प्रवाल भित्तिया (simant pradeshiy praval bhitti) –

सीमांत प्रदेशीय प्रवाल भित्तियो का अक्षांशीय विस्तार 25° से 35° उत्तरी तथा दक्षिणी अक्षांशो के मध्य आता है। यहां प्राचीन काल में प्रवाल श्रेणियां थी, लेकिन प्लेस्टोसीन हिमयुग में समुद्र में जल की सतह नीची हो जाने से ऐसी प्रवाल भित्तिया धीरे-धीरे नष्ट होती गई।

उन प्रवाल भित्तियो का आज महासागरों में सबसे पुराने द्वीप  के रूप में अस्तित्व पाया जाता है। उदाहरण के लिए बरमुंडा, बहामा तथा हवाई द्वीप आदि के चबूतरे स्पष्टत प्राचीन प्रवाल के जमाव से बने हैं। 

प्रवाल भित्ति के उत्पत्ति के सिद्धांत (praval bhitti ke utpatti ke siddhant) –

प्रवाल भित्ति चूनायुक्त विशेष जीवो जिनमें प्रवाल या मूंगा मुख्य है,की निर्माण क्रिया से विकसित होती है। इसमें अन्य सहजीवों एवं सहायक सूक्ष्म जीवों का एवं उनके द्वारा किये गए जमावों का भी योगदान बना रहता है। इनका विकास विशेष भौगोलिक दशाओं में महाद्वीपीय निमग्न तट एवं विशेष छिछले सागर के चबूतरे पर या ज्वालामुखी पर्वतों एवं अंतः सागरीय श्रेणियों के उभार पर समुद्र तल से निश्चित गहराई पर होने लगता है।

सामान्यतः अधिकांश प्रवाल अद्धोष्ण प्रदेश में 60 मीटर की गहराई तक ही विकसित होते रहे हैं किंतु कुछ विशेष दशाओं में ये अधिक गहराई एवं उस प्रदेशों में भी कहीं अधिक गहराई पर भी आशा के विपरीत पाये जाते हैं। अतः इस प्रकार की विशिष्ट दशाओं, अपवादों एवं प्रतिकूल स्थितियों में भी महत्वपूर्ण प्रवाल भित्तियो के विकास पर विद्वानों ने भिन्न-भिन्न मत या सिद्धांतों के द्वारा ऐसी सभी उत्पत्ति या विकास को समझाने का प्रयास किया है। 

प्रवाल भित्ति की उत्पत्ति एवं विकास से संबंधित निम्न सिद्धांत प्रमुख है- 
(1) डार्विन का अवतलन या निमज्जन सिद्धांत ।

(2) डेली का हिमनद नियंत्रण सिद्धांत ।

(3) मरे का स्थल पर आधारित विलियन (घोल) सिद्धांत ।

(4) आगासीज का मत। 

(5) गार्डीनर का स्थिर स्थल सिद्धांत। 

(6) डेविस का सिद्धांत। 

प्रवाल भित्ति का महत्व (praval bhitti ka mahatva) –

(1) विभिन्न जीव जंतु एवं वनस्पतियों का आश्रय स्थल है। 

(2) प्रवाल भित्तिया पृथ्वी पर सर्वाधिक विविध और बहुमूल्य पारिस्थितिक तंत्रो में सेे एक है। 

(3) प्रवाल को “सामुद्रिक वर्षावन” के रूप में भी जाना जाता है।

(4) प्रवाल भित्तिया बहुत से जलीय जीवों के आवास स्थल के रूप में कार्य करता है।

(5) प्रवाल भित्तियां पोषक तत्वों का चक्रण, समुद्र खाद्य श्रृंखला तथा कार्बन तथा नाइट्रोजन स्थिरीकरण में भी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती है।

(6) स्वास्थ्य प्रवाल भित्तियों के धरातल ऊबड़-खाबड़ संरचना होती है, जो आने वाली समुद्री तरंगों की तीव्रता को कम करती है।

प्रश्न :- विश्व की सबसे बड़ी प्रवाल भित्ति कौन सी है?

उत्तर :- ऑस्ट्रेलिया की ग्रेट बैरियर रीफ विश्व की सबसे बड़ी प्रवाल भित्ति है! यह ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर स्थित है!

प्रश्न :- भारत में प्रवाल भित्ति कहां पाई जाती है?

उत्तर :- भारत में प्रवाल भित्ति अंडमान निकोबार, लक्षद्वीप, कच्छ की खाड़ी एवं मन्नार की खाड़ी में पाई जाती है!

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