जीवाश्म क्या है (jivashm kya hai) –
जीवो की मृत्यु के पश्चात उनके शरीर का अपघटन हो जाता है और वह समाप्त हो जाते है परंतु कभी-कभी जीव या उसके कुछ भाग ऐसे वातावरण में चले जाते हैं जिसके कारण इनका अपघटन पूरी तरह से नहीं हो पाता, जीवो के इस तरह परिरक्षित अवशेष जीवाश्म (Jivashm) कहलाते हैं !
उदाहरण – कोई मृत कीट मिट्टी में सुख कर कठोर हो जाता है तथा उसमें कीट के शरीर की छाप सुरक्षित रह जाती है! लिओनार्दो दा विंची को जीवाश्म (Jivashm) विज्ञान (पैलेन्टलाजी) का जनक कहा जाता है!
जीवाश्म प्राचीन जीवन के एकमात्र प्रत्यक्ष प्रमाण को प्रदर्शित करते हैं! यह जीवो के परिरक्षित कंकालो, अस्थियों और कवचों के रूप में पाए जा सकते हैं अथवा व्यवहारगत क्रियाकलापों जैसे जीवों के पथों, पथचिन्हों और पथचिन्हों की परिरक्षित छापों के रूप में भी पाए जा सकते हैं!
जीवाश्मीकरण या जीवाश्म का बनना (Jivashmikaran ki prakriya) –
जीवाश्मीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी जीव के शरीर को पेट्रफिकेशन द्वारा जीवाश्म में परिवर्तित किया जाता है या अकार्बनिक पदार्थ द्वारा क्रमिक जोड़ या कार्बनिक पदार्थों के प्रतिस्थापन के द्वारा निर्मित होता है जीवाश्मीकरण की प्रक्रिया के लिए सामान्य रूप से जीवों के कंकाल ,नाखून ,दांत ,हड्डी आदि कठोर हिस्से होने चाहिए क्योंकि नरम हिस्से आमतौर पर विघटित हो जाते हैं ! एक जीव की मृत्यु के बाद उसे तुरंत दफन किया जाना चाहिए ताकि नष्ट ना हो ! अधिकांश मृत जीव पानी में जमा हो जाते हैं इसलिए जीवाश्म के लिए सबसे अनुकूल परिस्थितियां समुद्र में मौजूद हैं!
जीवाश्म का महत्व / उपयोग (Importance Of Jivashm in hindi) –
(1) जीवाश्म विश्व के प्राचीन भूगोल के निर्माण में मदद करते हैं !
(2) विकासीय संबंध स्थापित करने में जीवाश्म महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं!
(3) जीवाश्म विज्ञान प्राकृतिक वैज्ञानिक संकेतकों से अतीत की जलवायु का अध्ययन करता है!
(4) तापमान की भिन्नता और नमी संभवत सबसे स्पष्ट रूप से जीवाश्म पौधों और जानवरों द्वारा इंगित की जाती है !
(5) पूर्व जीव के द्वारा चट्टानों में छोड़ गए जीवाश्म रिकॉर्ड के अध्ययन के बारे में जीवाश्म विज्ञानी द्वारा जैविक विकास के परिदृश्य की कल्पना की गई है!
(6) शैलों के सहसंबंध में जीवाश्मों का उपयोग किया जाता है!
जीवाश्म के प्रकार (Types of Fossils in hindi) –
(1) संपूर्ण परिरक्षित प्राणी
(2) प्रायः अपरिवर्तित दशा में परिलक्षित पाए जाने वाले कंकाल
(3) कार्बनीकरण
(4) कंकालों का सॉंचा
(5) अश्मीभवन
(6) चिन्ह
(1) संपूर्ण परिरक्षित प्राणी-
ऐसा कभी कभार ही देखने को मिलता है कि बिना किसी टूटने या खंडित होने की प्रक्रिया के कारण जीवाश्म प्राप्त हो, किंतु ऐसे परिरक्षित जीवाश्म के उदाहरण मैमथ और राइनोसिरस के जीवाश्म हैं, जो टुंड्रा के हिम में जमे हुए पाए गए हैं.
(2) प्राय- अपरिवर्तित दशा में परिरक्षित पाए जानेवाले कंकाल-
कभी-कभी जब शैलों में केवल कंकाल ही पाया जाता है तब यह देखा गया है कि वह अपनी पहले जैसी, तब की अवस्था में है जब वह समाधिस्थ हुआ था. फॉसिल दशा में कंकाल का कार्बनिक द्रव्यों का लोप हो जाता है.
(3) कार्बनीकरण –
कुछ कुछ प्राणियों में, जैसे ग्रैप्टोलाइट, जिनमें कंकाल काइटिन का बना होता है, मूल द्रव्य कार्बनीकृत हो जाता है.
(4) कंकालों का सांचा –
कभी-कभी कंकाल या कवच विलीन हो जाते हैं और उनके स्थान पर उनका केवल सांचा रह जाता है. यह इस प्रकार होता है कि कवच के अवसाद से ढक जाने के बाद, कवच का आंतरिक भाग भी अवसाद वाले द्रव्य से भर जाता है.
(5) अश्मीभवन-
कभी कभी फॉसिलों में उन जीवों के, जिनके ये फॉसिल हो गए हैं, सूक्ष्म आकार तक देखने को मिलते हैं. अंतर केवल इतना होता है कि कंकालों का मूल द्रव्य किसी खनिज द्वारा प्रतिस्थापित हो जाता है. इस क्रिया को अश्मीभवन कहते हैं.
(6) चिह्न –
कभी-कभी जीवों के पदचिह्न बिल, छिद्र आदि शैलों में पाए जाते हैं. ये जीव-जंतुओं के कठोर अंगों के कोई भाग नहीं हैं और इसलिए इनको फॉसिल नहीं कहा जा सकता, फिर भी ये उतने ही महत्व के समझे जाते हैं .
विकास से संबंध स्थापित करने में जीवाश्म का महत्व (vikas mein sambandh sthapit karne mein jivan ka mahatva) –
जीवाश्म विकासीय संबंध स्थापित करने में अति महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं! जब जीवाश्मों की खुदाई से प्राप्ति की जाती है तो उनकी प्राप्ति की गहराई से पता लग जाता है कि वह लगभग कितना पुराना है। ‘फॉसिल डेटिंग’ की प्रक्रिया इस काम में सहायक सिद्ध होती है! जो जीवाश्म जितनी अधिक गहराई से प्राप्त होगा वह उतना ही पुराना होगा!
लगभग 10 करोड़ वर्ष पहले समुद्र तल में अकशेरुकी जीवों के जो जीवाश्म प्राप्त होते हैं वे सब से पुराने हैं! इस के कुछ मिलियन वर्ष बाद जब डायनोसौर मरे तो उनके जीवाश्म अकशेरुकी जीवों के जीवाश्मों से ऊपरी सतह में बने! इसके कुछ मिलियन वर्ष बाद जब घोड़े के समान जीव जीवाश्मों में बदले तो उन्हें डायनोसौरों के जीवाश्मों से ऊपर स्थान मिला। इसी से उनका विकासीय संबंध स्थापित होता है!
प्रश्न:- जीवाश्म किसे कहते हैं (jivashm kise kahate hain)
उत्तर :- जीवो की मृत्यु के पश्चात उनके शरीर का अपघटन हो जाता है और वह समाप्त हो जाते है परंतु कभी-कभी जीव या उसके कुछ भाग ऐसे वातावरण में चले जाते हैं जिसके कारण इनका अपघटन पूरी तरह से नहीं हो पाता, जीवो के इस तरह परिरक्षित अवशेष जीवाश्म(Jivashm)कहलाते हैं
प्रश्न :- जीवाश्मीकरण क्या है?
उत्तर :- जीवाश्मीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी जीव के शरीर को पेट्रफिकेशन द्वारा जीवाश्म में परिवर्तित किया जाता है या अकार्बनिक पदार्थ द्वारा क्रमिक जोड़ या कार्बनिक पदार्थों के प्रतिस्थापन के द्वारा निर्मित होता है जीवाश्मीकरण की प्रक्रिया के लिए सामान्य रूप से जीवों के कंकाल ,नाखून ,दांत ,हड्डी आदि कठोर हिस्से होने चाहिए क्योंकि नरम हिस्से आमतौर पर विघटित हो जाते हैं ! एक जीव की मृत्यु के बाद उसे तुरंत दफन किया जाना चाहिए ताकि नष्ट ना हो
प्रश्न :- विकास से संबंध स्थापित करने में जीवाश्म का क्या महत्व है
उत्तर :- जीवाश्म विकासीय संबंध स्थापित करने में अति महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं! जब जीवाश्मों की खुदाई से प्राप्ति की जाती है तो उनकी प्राप्ति की गहराई से पता लग जाता है कि वह लगभग कितना पुराना है। ‘फॉसिल डेटिंग’ की प्रक्रिया इस काम में सहायक सिद्ध होती है।
जो जीवाश्म जितनी अधिक गहराई से प्राप्त होगा वह उतना ही पुराना होगा। लगभग 10 करोड़ वर्ष पहले समुद्र तल में अकशेरुकी जीवों के जो जीवाश्म प्राप्त होते हैं वे सब से पुराने हैं। इस के कुछ मिलियन वर्ष बाद जब डायनोसौर मरे तो उनके जीवाश्म अकशेरुकी जीवों के जीवाश्मों से ऊपरी सतह में बने। इसके कुछ मिलियन वर्ष बाद जब घोड़े के समान जीव जीवाश्मों में बदले तो उन्हें डायनोसौरों के जीवाश्मों से ऊपर स्थान मिला। इसी से उनका विकासीय संबंध स्थापित होता है।
प्रश्न :- फॉसिल डेटिंग क्या है
फॉसिल डेटिंग में जीवाश्म में पाए जाने वाले किसी एक तत्व के विभिन्न समस्थानिको के अनुपात के आधार पर जीवाश्म का समय-निर्धारित किया जाता है | इसमें कार्बन-14 समस्थानिक का उपयोग होता है!
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nice post