उष्णकटिबंधीय चक्रवात क्या है? उष्णकटिबंधीय चक्रवात के प्रकार, उत्पति, विशेषता, प्रभाव

उष्णकटिबंधीय चक्रवात क्या है (ushna katibandh chakrawat kya hai)-

अयनवर्ती क्षेत्रों (30°उ. से 30° द. अक्षांश) में उत्पन्न चक्रवात को उष्णकटिबंधीय चक्रवात कहते हैं! शीतोष्ण चक्रवातों की तरह इन चक्रवातों में समरूपता नहीं होती हैं! उनका विकास केवल गर्म सागरों के ऊपर होता है और इनके केंद्र में वायुदाब बहुत कम होता है!

भूमध्य रेखा पर यह चक्रवात नहीं पाए जाते हैं! यह चक्रवात सागरों के ऊपर तीव्र गति से चलते हैं, परंतु स्थल पर पहुंचते पहुंचते क्षीण हो जाते हैं! उष्णकटिबंधीय चक्रवातों का भ्रमण पथ भिन्न-भिन्न होता है, फिर भी यह व्यापारिक पवनों का अनुसरण करते हुए पूर्व से पश्चिम दिशा में अग्रसर होते हैं, परंतु ये चक्रवात उपोष्णकटिबंधीय में प्रविष्ट होते ही समाप्त होने लगते हैं! 

उष्णकटिबंधीय चक्रवात के प्रकार (ushna katibandh chakrawat ke prakar)- 

(1) उष्ण कटिबंधीय विक्षोभ! 

(2) उष्ण कटिबंधीय अवदाब! 

(3) उष्ण कटिबंधीय तूफान! 

(4) हरिकेन या टाइफून! 

उष्णकटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति (ushna katibandh chakrawat ki utpatti) –

उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में महासागरों के धरातल पर होती है! इन चक्रवातों के अंतर्गत व्यापारियों पवनों की पेटी में महाद्वीपों के पूर्वी भागों में एवं उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में विकसित होने वाली सभी प्रकार के विक्षोभ एवं चक्रवातों को सम्मिलित किया जाता है! 

इन्हें चीन सागर में टाइफून, अटलांटिक महासागर में हरिकेन, बंगाल की खाड़ी में चक्रवात की खाड़ी में बिली-बिली कहते हैं! इनकी उत्पत्ति मुख्यता 8° अक्षांश से 20° अक्षांश के मध्य होता है किंतु इनका प्रभाव से 35° अक्षांश पर दोनों गोलार्द्ध में बना रहता है! 

उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की गति साधारण से लेकर प्रचंड तक होती है! क्षीण चक्रवातों में पवन की गति 32 किमी प्रति घंटा होती है, जबकि हेरिकेन में पवन गति 120 किमी प्रति घंटा से भी अधिक देखी जाती है!

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात सदैव गतिशील नहीं होते हैं! कभी-कभी एक ही स्थान पर कई दिनों तक वर्षा करते रहते हैं! सामान्यत; इन चक्रवातों की जीवन अवधि 5 से 7 दिन की होती है! यही कारण हैं कि ये केवल तटीय भागों को ही प्रभावित कर पाते हैं! 

उष्णकटिबंधीय चक्रवात की विशेषताएं (ushna katibandh chakrawat ki visheshtaen)-

(1) ये मौसम तथा जलवायु के अध्ययन विशेष महत्व रखते हैं! 

(2) ग्रीष्म काल के आरंभ या उत्तरार्ध में काफी भयंकर होते हैं! 

(3) ये चक्रवात भंयकर निम्नदाब वाले प्रचंड वायु के विशाल भंवर होते हैं! 

(4) इसमें समभाव रेखाओं का घेरा बना हुआ होता है, जिसकी दाब प्रवणता काफी तीव्र होती है! 

(5) जब ये स्थानीय भागों की ओर बढ़ते हैं तो इनकी गति शीघ्र ही क्षीण हो जाती है! 

उष्णकटिबंधीय चक्रवातों का प्रभाव (ushna katibandh chakrawat ka prabhav) –

(1) फसल और खाद्य आपूर्ति की समस्या – 

प्रचंड वायु एवं भारी वर्षा खड़ी फसल एवं निम्न स्थान पर एकत्रित किए गए खाद्यान्नों को सबसे अधिक हानि पहुचाते हैं! केला और नारियल जैसी रोपण फसलें सबसे अधिक प्रभावित होती है! समुद्री जल, स्थल पर आकर मृदा में लवणता बढ़ाता है और भूमि को कृषि के लिए अनुपयोगी बना देता है! 

(2) परिवहन एवं संचार की समस्या – 

चक्रवाती तूफान पेड़ों, बिजली एवं टेलीफोन के खंभों को उखाड़ देता है तथा कमजोर पुल क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप सड़क, परिवहन, एवं संचार बाधित हो सकता हैं! 

(3) महामारियों का प्रकोप –

बाढ़ की भॉंति चक्रवर्ती भी मनुष्य के स्वास्थ्य को हानि पहुंचाते हैं! तेज हवाएं अपने साथ रोग के कीटाणुओं को संचारित करती है तथा पेचिश और मलेरिया जैसे संक्रामक रोग फैलाती है! जहां तहां जल जमाव से विषाणुओं का प्रकोप बढ़ जाता है! 

(4) नौ-परिवहन के लिए आपदा – 

चक्रवातों से समुद्री जहाजों को बड़ा खतरा रहता है और यह चक्रवात इन जहाजों को भारी क्षति पहुंचाते हैं, चाहे वे खुले समुद्र में हो या फिर बंदरगाह पर लंगर डालकर खड़े हो! यदि जहाजों को समय पर चेतावनी मिल जाए तो यह चक्रवात के मार्ग से दूर जाकर अपना बचाव कर सकते हैं! 

उष्णकटिबंधीय चक्रवातों का भौगोलिक क्षेत्र (ushna katibandh chakrawat ka bhaugolik kshetra) – 

(1) उत्तरी अटलांटिक महासागर

(2) उत्तरी पूर्वी प्रशांत महासागर

(3) उत्तरी पश्चिमी प्रशांत महासागर

(4) दक्षिणी चीन सागर

(5) बंगाल की खाड़ी और अरब सागर! 

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