सतत पोषणीय विकास क्या है? इसकी परिभाषा, संकल्पना, उद्देश्य, महत्व, उदा.

धारणीय या सतत पोषणीय विकास क्या है (sustainable development in hindi) –

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सतत पोषणीय विकास एक प्रकार से समाज, पर्यावरण तथा अर्थव्यवस्था का संतुलित एकीकरण है! सतत विकास इस तरह से होता है कि यह व्यापक संभावित क्षेत्रों, देशों और यहां तक कि आनेवाली पीढ़ियों को भी लाभ पहुंचाता है! दूसरे शब्दों में कहा जाए, तो हमें निर्णय करते समय समाज, पर्यावरण तथा अर्थव्यवस्था पर उसके संभावित प्रभावों का विचार कर लेना चाहिए! हमें ध्यान रखना चाहिए कि हमारे निर्णय एवं कार्य दूसरों को प्रभावित करते हैं तथा हमारे कार्यों का भविष्य पर प्रभाव पड़ता है

सतत पोषणीय विकास ऐसा विकास है जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को भावी पीढ़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति क्षमता का समझौता किए बिना पूरा करता हैं! यह परिभाषा दो रूपों में महत्वपूर्ण है – पहली, प्राकृतिक संसाधन न केवल हमारे जीविकोपार्जन के लिए जरूरी है, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के जीविकोपार्जन के लिए भी उतना ही आवश्यक है! दूसरी, वर्तमान में किसी भी प्रकार के विकास-संबंधी कार्य को करते समय उसके भविष्य में आने वाले परिणामों को ध्यान में रखना आवश्यक है! इसमें पर्यावरण संरक्षण एवं जलवायु परिवर्तन पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है!

सतत पोषणीय विकास की परिभाषा (definition of sustainable development in hindi) –

सतत पोषणीय आर्थिक विकास का अर्थ है कि विकास पर्यावरण को बिना नुकसान पहुंचाए हो और वर्तमान विकास की प्रक्रिया भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं की अवहेलना न करें!

सतत पोषणीय विकास की संकल्पना (satat poshniya vikas ki sankalpana ) –

सतत विकास की संकल्पना का वास्तविक विकास 1987 में “हमारा साझा भविष्य (आवर कॉमन फ्यूचर)” नामक रिपोर्ट जिसे ‘ द ब्रंटलैण्ड रिपोर्ट के नाम से भी जाना जाता है, के आने के बाद हुआ एवं तभी सही शब्द का व्यापक रूप से प्रयोग किया जाने लगा! संयुक्त राष्ट्र द्वारा गठित आयोग ने विकास के लिए परिवर्तन हेतु वैश्विक प्रारूप का प्रस्ताव पेश किया! ब्रंटलैण्ड रिपोर्ट ने हमारे रहन-सहन एवं शासन में पुनर्विचार की आवश्यकता पर जोर दिया! मानवता के लक्ष्यों एवं आकांक्षाओं को प्राप्त करने के लिए पुरानी समस्याओं पर नए तरीके से विचार करने तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग एवं समन्वय पर बल दिया!

सतत पोषणीय विकास के उद्देश्य (satat poshniya vikas ka uddeshya) –

सतत पोषणीय विकास के अर्थ और अवधारणा से इतना तो स्पष्ट हो चुका है कि सतत विकास मानव के अस्तित्व के लिए बुनियादी शर्त है! मानव पृथ्वी पर तब तक है जब तक अन्य पशु-पक्षी और पेड़-पौधे! स्वतंत्र रूप से हमारा पृथ्वी पर कोई अस्तित्व नहीं है इसलिए हमें सतत विकास के माध्यम से निम्नलिखित उद्देश्यों की पूर्ति करनी चाहिए –

(1) प्राकृतिक एवं मानव निर्मित संसाधनों का संरक्षण करना!

(2) उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का सीमित एवं नियोजित विदोहन करना

(3) पर्यावरण अनुकूल मानवीय गतिविधियां!

(4) उत्पादन के अवसरों का विकास करना!

(5) गरीबी निवारण एवं सतत आजीविका!

(6) नवीकरणीय संसाधनों पर निर्भर रहना!

सतत पोषणीय विकास को प्राप्त करने के लिए रणनीतियां –

(1) अंतः निर्भरता –

एक संपोषणीय समाज वह होता है जो न तो किसी ऐसे संसाधनों का आयात करता है जिससे संबंधित समुदाय वंचना (कमी) का शिकार हो जाए और न ही अपने यहां उत्पन्न प्रदूषकों का अन्य समाजों में स्थानांतरण करता है! इस तरह परस्पर निर्भरता से सभी समाजों को लाभ पहुंचता है!

(2) अनुकूलनशीलता –

एक सतत रूप से विकसित समाज बदलते पर्यावरण के अनुसार खुद को बदलने की क्षमता रखता है! ऐसा वह नई-नई तकनीकों एवं अविष्कारों आदि को अपनाकर करता हैं!

(3) प्रतिस्थापन –

गैर-नवीकरणीय संसाधनों की अपक्षय की दर नवीनीकृत प्रतिस्थापकों से अधिक नहीं होनी चाहिए! सतत विकास यह सुनिश्चित करता कि गैर-नवीकरणीय संसाधनों का प्रतिस्थापन नवीकरणीय संसाधनों के माध्यम से किया जा सकता है! हालांकि गैर नवीकरणीय संसाधनों का पूर्ण प्रतिस्थापन लगभग असंभव सा है!

(4) संस्थागत प्रतिबद्धता –

इसके अंतर्गत के सभी नीतियां, राजनीतिक इच्छाशक्ति, कानूनी रूपरेखा संवैधानिक प्रावधान और वैधानिक संस्थाओं के बीच आपसी समन्वय आते हैं, जिनके बिना सतत विकास को वास्तविक रूप से संभव नहीं बनाया जा सकता! इसके अलावा शिक्षा के माध्यम से भी लोगों में सतत विकास की जागरूकता से संबंधित समझ को विकसित किया जा सकता है!

सतत पोषणीय विकास को प्राप्त करने के लिए रणनीतियां –

सतत पोषणीय विकास तभी संभव हो सकता है, जब उसे प्राप्त करने की सुनिश्चित रणनीति पहले से ही पता हो! पर्यावरण की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए किया गया कोई भी प्रयास सतत विकास की ओर ही ले जाता है! यहां कुछ प्रमुख रणनीतियों की चर्चा की गई है, जिसके माध्यम से सतत विकास को संभव बनाया जा सकता है –

(1) पारिस्थितिकी संरक्षण –

सतत विकास के लिए यहां बहुत आवश्यक है कि वन संसाधनों, जैव विविधता तथा अन्य पर्यावरणीय घटकों का न केवल संरक्षण किया जाए बल्कि उसका संवर्धन भी किया जाए! इस दिशा में अनेक क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रयास किए गए हैं, जिनका प्रभावी क्रियान्वयन सतत विकास की गारंटी होगा!

(2) जनसंख्या वृद्धि में कमी करना –

जनसंख्या में वृद्धि से संसाधनों पर दबाव बढ़ता है, जिससे समृद्धि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जो सतत विकास की दृष्टि से सही नहीं है! इसलिए जनसंख्या वृद्धि पर प्रभावी नियंत्रण होना सतत विकास के लिए एक अनिवार्य शर्त है!

(3) स्वच्छ घरेलू ईधन –

विश्व में अभी भी बहुत बड़ी आबादी घरेलू ईंधन के रूप में लकड़ी, उपले, कोयले आदि का उपयोग करती है, जो स्वास्थ्य और पर्यावरण की दृष्टि से काफी हानिकारक है! इसलिए ईंधन के रूप में एल.पी.जी., सी.एन.जी., जैसे स्वस्थ ईधनों के प्रयोग को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, तभी हम प्रदूषण में कमी के साथ-साथ धारणीय विकास को प्राप्त कर सकते हैं!

(4) पर्यावरण हितैषी नवीन तकनीकों के प्रयोग –

आजकल कई ऐसी तकनीक और प्रक्रियाएं है, जिनका प्रयोग न केवल हम अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर रहे हैं बल्कि भविष्य के लिए भी संसाधनों सुरक्षित कर रहे हैं! उदाहरण के लिए, पेट्रोल के साथ ही इथेनॉल का प्रयोग गाड़ियों और कारखानों में करने से वायु प्रदूषण में कमी के अलावा निवास में इन दिनों पर हमारी निर्भरता में भी कमी आ रही है!

(5) ऊर्जा के गैर पारंपरिक स्रोतों का उपयोग –

विभिन्न देशों अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अभी भी बड़े पैमाने पर तापीय ऊर्जा पर निर्भर है! थर्मल पावर प्लांट में जीवाश्म ईंधन के जलने से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसें निकलती है, जो ग्लोबल वार्मिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है! यह पर्यावरण के साथ-साथ मानव जीवन पर भी संकट उत्पन्न करती है! इसलिए सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल विद्युत ऊर्जा आदि का प्रयोग करना चाहिए!

सतत पोषणीय विकास का महत्व (satat poshniya vikas ka mahatva)-

(1) सतत पोषणीय विकास मिट्टी की अखंडता को बनाए रखते हुए उच्च पैदावार को बढ़ावा देने के लिए प्रभावी सेटिंग तकनीक एवं फसल रोटेशन जैसे टिकाऊ कृषि तरीकों पर केंद्रीय थे जो एक बड़ी आबादी के लिए भोजन का उत्पादन करता है!

(2) सतत विकास पद्धतियों से जलवायु परिवर्तन को कम किया जा सकता है सतत विकास पेट्रोल, डीजल, प्राकृतिक गैस और कोयले के तरह जीवाश्म ईंधन आधारित स्रोतों के उपयोग को कम करने की तलाश है! ऊर्जा के जीवाश्म ईंधन स्त्रोत अधारणीय है क्योंकि वे भविष्य में समाप्त हो जाएंगे और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं!

(3) विकासशील देश जो जीवाश्म ईंधन का उपयोग नहीं कर सकते वह अपनी अर्थव्यवस्थाओं को गति देने के लिए ऊर्जा के नवीकरणीय संसाधनों का लाभ उठा सकते हैं! नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकी के विकास से रोजगार के अवसरों का सृजन किया जा सकता है!

(4) सतत विकास के जरिए आवश्यक मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकती हैं! जनसंख्या वृद्धि के कारण लोगों को भोजन, पानी और आवास जैसे सीमित संसाधनों के लिए हाथापाई करनी होगी! इस बुनियादी जरूरतों का पर्याप्त प्रावधान लगभग पूरी तरह से सतत विकास पर टिका है, जो उन्हें लंबे समय तक बनाए रखने में सक्षम होगा!

सतत पोषणीय विकास का उदाहरण (satat poshniya vikas ka udaharan) –

(1) सौर ऊर्जा –

सौर ऊर्जा का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह पूरी तरह से स्वतंत्र और और असीमित मात्रा में उपलब्ध है! ये दोनों कारक उपभोक्ताओं को बहुत बड़ा लाभ प्रदान करते हैं और प्रदूषण को कम करने में भी मदद करते हैं! इस प्रकार की ऊर्जा के साथ गैर नवीकरणीय ऊर्जा की जगह पर्यावरण और आर्थिक रूप से प्रभावी दोनों हैं!

(2) पवन ऊर्जा –

पवन ऊर्जा एक और आसानी से उपलब्ध ऊर्जा स्रोत है! पवन ऊर्जा की शक्ति का उपयोग पवन चक्की के माध्यम से किया जा सकता है! हालांकि इसके निर्माण लागत और उपयुक्त स्थान खोजने कारण इस तरह की ऊर्जा का उत्पादन हर स्थान पर संभव नहीं है! इस प्रकार की ऊर्जा को प्राप्त करने के लिए अच्छे निवेश की आवश्यकता होती है परंतु यह नुकसानदायक या हानिकारक नहीं है!

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