प्रथम विश्व युद्ध (Pratham Vishav Yudh 1914) के कारण एवं परिणाम

Pratham Vishav Yudh

प्रथम विश्व युद्ध ( First world War in hindi) –

प्रथम विश्वयुद्ध (Pratham Vishav Yudh) की शुरुआत 28 जुलाई 1914 को ऑस्ट्रिया द्वारा सर्वे पर आक्रमण किए जाने के साथ हुई! यह युद्ध 4 वर्षों तक चला! इसमें 37 देशों ने भाग लिया! प्रथम विश्व युद्ध ( Pratham Vishav Yudh)के दौरान संपूर्ण विश्व मित्र राष्ट्र और धुरी राष्ट्र नाम के दो खेमों में बॅंट गया!
धुरी राष्ट्र का नेतृत्व जर्मनी ने किया इसमें शामिल अन्य देश ऑस्ट्रिया, हंगरी, तुर्की, बुल्गारिया और इटली थे! वही मित्र राष्ट्रों में इंग्लैंड, जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस एवं फ्रांस शामिल है!

प्रथम विश्व युद्ध के कारण (Pratham Vishav Yudh) –

प्रथम विश्वयुद्ध को अचानक घटने वाली घटनाओं के रूप में नहीं देखा जा सकता है! वस्तुतः वह तो प्रथम विश्व युद्ध(Pratham Vishav Yudh) हेतु अनेक कारण उत्तरदाई थे, जिन्हें निम्न बिंदुओं के अंतर्गत समझा जा सकता है –

दीर्घकालिक कारण –

(1)  कूटनीतिक संधियां –

प्रथम विश्वयुद्ध का सर्वप्रथम मुख्य कारण कूटनीतिक संधियां थी  गुप्त संधियों की प्रणाली एवं यूरोप में गुटबंदी का जनक जर्मनी के चांसलर बिस्मार्क को माना जाता है!
1871 ई. में जर्मनी के एकीकरण के क्रम में बिस्मार्क ने फ्रांस से अल्सास- लॉरेन का क्षेत्र लेकर उसे आहत कर दिया था! बिस्मार्क को सदैव यह भय रहता था कि फ्रांस यूरोप के दूसरे राष्ट्रों से मित्रता कर जर्मनी से बदला लेने की कोशिश करेगा, इसलिए बिस्मार्क ने यूरोपीय राजनीति से फ्रांस को अलग-थलग रखने हेतु गुप्त संधियों को अंजाम दिया!
इस सिद्धांत के आधार पर 1882 में जर्मनी, ऑस्ट्रिया व इटली ने मिलकर त्रिगुट का निर्माण किया, जिसका उद्देश्य फ्रांस पर नजर रखना था! इस ग्रुप के विरुद्ध 1907 में इंग्लैंड, फ्रांस और रूस ने मिलकर त्रि-देशीय मैत्री संघ का निर्माण किया!
इस प्रकार यूरोप की शक्तियां दो गुटों में बंट गई थी! कूटनीतिक संधियों के कारण अंतरराष्ट्रीय तनाव एवं कटुता मे वृद्धि हुई, युद्ध के वातावरण का सृजन हुआ और अंततः प्रथम विश्वयुद्ध का विस्फोट हुआ!

(2) साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा –

औद्योगिक क्रांति की सफलता के पश्चात यूरोपीय राष्ट्रों में कच्चे मालवा बाजार की प्राप्ति हेतु साम्राज्यवाद की प्रतिस्पर्धा प्रारंभ हो गई थी!
 1870 ई. का पश्चात इस प्रतिस्पर्धा में पुराने साम्राज्यवादी देशों ( ब्रिटेन, फ्रांस, और रूस) के अलावा तीन नए साम्राज्यवादी देश ( जर्मनी, इटली,व जापान) भी शामिल हो गए, क्योंकि एशिया और अफ्रीका में पुराने साम्राज्यवादी का अधिपत्य पहले ही हो गया था! अत: पुराने साम्राज्यवादी देशों व नवीन साम्राज्यवादी देशों के मध्य युद्ध संभव था!

(3) अंतरराष्ट्रीय संस्था का अभाव –

प्रथम विश्व युद्ध के पहले विभिन्न राष्ट्रों के मध्य विवादों के निपटारे हेतु किसी भी अंतरराष्ट्रीय संस्था का पूर्ण अभाव था! जिससे इन राष्ट्रों के मध्य होने वाले वाले विवादों का शांतिपूर्ण निपटारा संभव ना हो सका!
ऐसी स्थिति में ऑस्ट्रिया के राजकुमार की हत्या संबंधी मामले में  सर्बिया की संलिप्तता या असंलिप्तता का विवाद शांतिपूर्ण तरीके से नहीं सुलझाया जा सका! अत: इसी बात की परिणति प्रथम विश्वयुद्ध के रूप में हुई!

(4) अस्त्र-शस्त्र की होड़ –

साम्राज्यवाद के इस युग में यूरोप के सभी राज्यों में सैनिक एवं अस्त्र शास्त्र में बढ़ोतरी की प्रतिस्पर्धा प्रारंभ हो गई थी, जिसके चलते पूरे यूरोप में सैनिक वातावरण निर्मित हो गया! ऐसे वातावरण में सैनिक अधिकारियों का स्थान देश की राजनीति में प्रमुख हो गया था!
जिसके कारण यूरोप में जब भी कोई संकट पैदा होता तो, सैनिक अधिकारी उसका समाधान युद्ध में ही खोजते थे! इस सैन्यवाद और युद्ध मानसिकता ने Pratham Vishav Yudh की पृष्ठभूमि को तैयार किया था!

प्रथम विश्व युद्ध (Pratham Vishav Yudh) के परिणाम –

(1) राजवंशों का अंत –

प्रथम विश्व युद्ध के परिणामस्वरुप अनेक राजवंशों, जैसे – आस्ट्रिया में हैप्सवर्ग वंश, जर्मनी में होहेनजोलर्न वंश और रुस में रोमनोव वंश, तुर्की में खलीफा की सत्ता समाप्त हो गई तथा इसकी जगह लोकतांत्रिक सरकारों की स्थापना की गई!

(2) अमेरिका का विश्व शक्ति के रूप में उदय –

प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात अमेरिका एक विश्व शक्ति के रूप में उभरा! युद्ध के दौरान यूरोपीय देशों ने भारी मात्रा में अमेरिका से सैन्य सामग्री, खाद्यान्न तथा कर्ज लिया था! फलतः Pratham Vishav Yudh के पश्चात इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी आदि यूरोपीय राष्ट्रों के मुकाबले अमेरिका का प्रभाव बढ गया!

(3) मुद्रा प्रसार –

युद्ध व्यय के कारण राष्ट्रों पर ऋण भार पड़ गया ऋणों को चुकाने के लिए यूरोपीय राष्ट्रों ने विशाल मात्रा में कागजी मुद्रा जारी की, जिससे मुद्रा का अवमूल्यन हो गया! मुद्रा अवमूल्यन का सर्वाधिक नुकसान नियमित वेतन भोगी जनता को हुआ!

(4) श्रमिकों द्वारा आंदोलन –

Pratham Vishav Yudh के दौरान अत्यधिक संख्या में नवयुवकों की मृत्यु के कारण श्रमिकों की प्रायः कमी हो गई! जिससे श्रमिकों की महत्ता बढ़ गई, अतः श्रमिक अधिक वेतन और सुविधाओं की मांग करने लगे! सरकार पर पभाव स्थापित करने हेतु श्रमिक यूनियन की स्थापना की गई तथा श्रमिक आंदोलन में वृद्धि हुई!
इन्हें भी पढ़ें –

Leave a Comment

error: Content is protected !!