महालवाड़ी व्यवस्था क्या है? महालवाड़ी व्यवस्था की विशेषताएं और प्रभाव

महालवाड़ी व्यवस्था क्या है? (mahalwari system in hindi) –

महालवाड़ी व्यवस्था (mahalwari vyavastha) का जन्मदाता हॉल्कट मैकेंजी को माना जाता है, जिन्होंने इस नीति को 1819 में प्रस्तावित किया! इस नीति को 1822 में  लॉर्ड हेस्टिंग्स के काल में पारित किया गया! आगे 1833 ई. में मार्टिन बर्ड तथा जेम्स टाम्सन ने भी इस बंदोबस्त को अपनाया! यह व्यवस्था उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश तथा पंजाब प्रांत में लागू की गई थी! इसके अंतर्गत ब्रिटिश साम्राज्य का कुल 30% भूभाग शामिल था! 

महाल शब्द का तात्पर्य जागीर अथवा गांव है! महालवाड़ी व्यवस्था के अंतर्गत भूमि कर की एक इकाई कृषक का खेत नहीं, बल्कि ग्राम या महल को माना गया, इसलिए इस व्यवस्था को महालवाड़ी व्यवस्था कहा जाता है!  

महालवाड़ी व्यवस्था के कारण एवं उद्देश्य (mahalwari vyavastha ke karan aur uddeshy) – 

अन्य भू राजस्व व्यवस्था के अनुरूप महालवाड़ी व्यवस्था का भी प्रमुख उद्देश्य अधिकाधिक धन की प्राप्ति थी! साथ ही इस व्यवस्था को अपनाने का एक कारण यह भी था कि जिन क्षेत्रों में यह व्यवस्था लागू की गई थी, उन क्षेत्रों में प्राचीन काल से ही भू राजस्व की अदायगी हेतु सम्मिलित उत्तरदायित्व की प्रणाली प्रचलित थी! 

महालवाड़ी व्यवस्था की विशेषताएं (mahalwari vyavastha ki visheshtayen) –

महालवाड़ी व्यवस्था की विशेषताएं इस प्रकार हैं –

(1) छोटे किसान यदि राजस्व नहीं चुका पाते थे, तो मजबूरन बड़े किसानों को ही राज्य से चुकाना पड़ता था! 

(2) महालवाड़ी व्यवस्था में गांव की समस्त भूमि ग्राम सभा की मानी गई थी! ग्रामसभा में से एक किसान लंबरदार होता था, जो पूरे गांव से राजस्व की वसूली कर सरकार को देता था! 

(3) सरकारी इसी लंबरदार को जमीन का मालिक मानती थी! 

(4) लंबरदार लगान ना चुका पाने पर कृषक से जमीन छीनने का अधिकार रखता था! 

(5) इस व्यवस्था में भू राजस्व की राशि अस्थाई रूप से प्रायः 30 वर्ष के लिए निर्धारित की गई थी! भू राजस्व की वसूली नगद के रूप में की जाती थी, जो कि उत्पादन का लगभग 66% होती थी! 

महालवाड़ी व्यवस्था के परिणाम या प्रभाव (mahalwari vyavastha ke prabhav) –

इस व्यवस्था के अंतर्गत कृषकों के शोषण को प्रोत्साहन मिला! भूमि की उत्पादकता को अत्याधिक मानते हुए भू-राजस्व की राशि को बहुत अधिक निश्चित की गई थी, अत: कृषक उचित समय पर लगान अदा नहीं कर पाते थे! इससे छोटे कृषकों से जमीन लेकर बड़े कृषकों को दे दी जाती थी! 

इस व्यवस्था में चूंकि संपन्न कृषक ही भू-राजस्व दे पाते थे, अत: लंबरदार छोटे किसान से भूमि लेकर बड़े कृषकों को दे देता था! इस प्रकार ये बड़े कृषक एक प्रकार की जमीदार के रूप में छोटे कृषकों का शोषण करने लगे! 

महालवाड़ी व्यवस्था का मूल्यांकन या निष्कर्ष (mahalwari vyavastha ka mulyankan)  – 

निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार द्वारा भारत में अनेक प्रकार की भू-राजस्व व्यवस्था को लागू किया गया था! प्राय: सभी प्रकार की भू राजस्व व्यवस्था के मुख्य 2 उद्देश्य थे

प्रथम अधिकाधिक धन प्राप्त करना! द्वितीय कृषकों की सुरक्षा! किंतु इन दोनों देशों में आंतरिक विरोधाभास था!
प्रथम उद्देश्य की पूर्ति कृषकों शोषण के उपरांत ही हो सकती थी! यही कारण है कि सभी प्रकार की भू राजस्व व्यवस्था में ब्रिटिश सरकार को तो आर्थिक लाभ प्राप्त हुआ, किंतु कृषकों की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई! कुल मिलाकर ब्रिटिश भू-राजस्व नीति से किसानों का निर्धनीकरण, ग्रामीण ऋणग्रस्तता, महाजनी प्रथा, कृषि दासता, उत्पादन में कमी आदि समस्याओं का विस्तार हुआ!  

1822 के रेगुलेशन के अनुसार यह बंदोबस्त असफल घोषित हुआ क्योंकि अधिकारों के दस्तावेज बनाने का काम पूरा नहीं हो सका, प्रत्येक क्षेत्र में होने वाली फसल का अनुमान लगाना काफी कठिन साबित हुआ, सरकार द्वारा फसल के उत्पादन का 80% राजस्व के रूप में रहना असंभव प्रतीत हुआ! 

महालवाड़ी व्यवस्था स्थाई बंदोबस्त के मुकाबले कैसे अलग थी – 

स्थाई बंदोबस्त में जमीदार के साथ स्थाई रूप से अनुबंध किया गया था, अतः इस व्यवस्था को स्थाई जमीदारी बंदोबस्त कहा गया! जबकि महालवाड़ी व्यवस्था के अंतर्गत भूमि कर की एक इकाई कृषक का खेत नहीं, बल्कि ग्राम या महल को माना गया, इसलिए इस व्यवस्था को महालवाड़ी व्यवस्था कहा जाता है!  

इन्है भी पढें –

स्थाई बंदोबस्त क्या है? स्थाई बंदोबस्त की विशेषताएं, गुण और दोष

रैयतवाड़ी व्यवस्था क्या है? रैयतवाड़ी व्यवस्था की विशेषताएं, गुण, दोष

Leave a Comment

error: Content is protected !!