लोक अदालत (Lok Adalat) क्या है इसके अधिकार एवं शक्तियां

लोक अदालत (Lok Adalat in hindi) –

लोक अदालत (Lok Adalat) भारत में वैकल्पिक विवाद समाधान की एक प्रणाली है! अर्थात – अनौपचारिक मध्यस्थों की सहायता से विवादों का समाधान करवाना है! लोक अदालत की वकालत मुख्यरूप से न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती द्वारा दी गई थी! 1976 में 42 वें संविधान संशोधन के द्वारा भारतीय संविधान में अनुच्छेद 39 (ए) जोड़ा गया, जिसमें निशुल्क विधिक सहायता का प्रावधान किया गया! 

राज्य से अपेक्षा की गई कि वह यह सुनिश्चित करे कि भारत का कोई भी नागरिक आर्थिक या किसी अन्य अक्षमताओं के कारण न्याय पाने से वंचित न रह जाए! सरकार द्वारा विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 से लागू हुआ! इस अधिनियम के अंतर्गत विधिक सहायता एवं लोक अदालत का संचालन का अधिकार राज्य स्तर पर राज्य विधिक सेवा प्राधिकार को दिया गया! आगे चलकर 2002 में इस अधिनियम में संशोधन करके स्थाई लोक अदालतों का  प्रावधान जोड़ा गया!   

लोक अदालत की वैधानिक स्थिति (Legal Status of Lok Adalat in hindi) – 

स्वतंत्रता के बाद पहला लोक अदालत शिविर 1982 में गुजरात में आयोजित किया गया था! यह पहल विवादों के निपटारे में बहुत सफल हुई थी! परिणामस्वरूप लोक अदालतों का देश के अन्य हिस्सों में प्रसार होने लगा! इस समय यह व्यवस्था एक स्वैच्छिक और समझौताकारी संस्था के रूप में कार्य कर रही थी परंतु इसके निर्णय के पीछे कोई कानूनी मान्यता नहीं थी! 

लेकिन लोक अदालतों की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए सुरक्षा तथा इसके द्वारा पारित फैसलों को वैधानिक मान्यता देने की मांग उठी! यही कारण है कि लोक अदालत को वैधानिक दर्जा प्रदान करने के लिए वैधानिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 में पारित किया गया!   

लोक अदालतों के अधिकार (Rights of Lok Adalats in hindi) –

लोक अदालत का अधिकार प्राप्त है कि वह निम्नलिखित विवादों में दोनों पक्षों के बीच समझौता कराने का निश्चय करें-

(1) कोई भी मामला जो न्यायालय में लंबित हो या 
(2) कोई मामला जो किसी न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आता हो लोक अदालत के समक्ष नहीं लाया जाएगा! 

इस प्रकार लोक अदालत केवल न्यायालय में लंबित मामलों को ही नहीं बल्कि उन मामलों का भी निपटारा कर सकती है जो न्यायालय में अभी तक नहीं पहुंचे! 

लोक अदालतो की शक्तियां (Powers of Lok Adalats in hindi) – 

लोक अदालतों को वही शक्तियां प्राप्त है जो कि सिविल कोर्ट को कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर (1908) के अंतर्गत प्राप्त होती है, जब निम्नलिखित मामलों में मुकदमा चलाना हो –

(1) किसी दस्तावेज को प्राप्त एवं प्रस्तुत कराना! 
(2) किसी गवाह को तलनामा भेजकर बुलाना और शपथ दिलवाकर उसकी परीक्षा लेना! 
(3) शपथ पत्रों पर साक्ष्यों की प्राप्ति करना! 
(4) किसी भी अदालत या कार्यालय से सार्वजनिक अभिलेख अथवा सामग्री की मांग करना! 

लोक अदालतों के लाभ (Benefits of Lok Adalats in hindi)- 

(1) इसमें कोई अदालती फीस नहीं लगती अगर कोई अदालती फीस का भुगतान कर दिया गया हो तो वह लोक अदालत में मामला निपटाने के बाद राशि लौटा दी जाती है! 

(2) यहां सभी पक्ष अपने वकीलों के माध्यम से न्यायाधीश से सीधे संवाद कर सकते हैं, जो कि नियमित न्यायालय में संभव नहीं है! 

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