भारत में जनजातिय विद्रोह क्या था? जनजातिय विद्रोह के कारण

जनजातिय विद्रोह या आंदोलन (tribal movement or rebellion  in hindi) –

ब्रिटिश औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध भारत में अनेक विद्रोह हो गए जिनमें से जनजातिय विद्रोह का विशेष महत्व है! यद्यपि जनजातियों के द्वारा किए गए ज्यादातर विद्रोह को कुचल दिए गए, किंतु इन विद्रोहों की असफलता के निचले तबके में भी ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति असंतोष उत्पन्न हो गया था, इसका लाभ स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय नेताओं को प्राप्त हुआ! 

जनजातिय विद्रोह के कारण (janjatiya vidroh ke karan ) – 

(1) सामाजिक कारण – 

आदिवासी मुख्यतः परंपरागत सामाजिक मान्यताओं पर विश्वास करते थे! किंतु ब्रिटिश सरकार ने सामाजिक क्षेत्र में कई नवीन कानूनों को लागू किया, जिनका जनजातियों ने विरोध किया! उदाहरणार्थ – ओडिशा के खोण्डों ने इस कारण विद्रोह किया था कि सरकार ने उनमें प्रचलित नरबलि को रोकने की कोशिश की थी! 

(2) राजनीतिक कारण –

ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के क्रम में अंग्रेजों ने भारत के आदिवासी इलाकों में भी पुलिस थाने और सैनिक छावनियां स्थापित की तथा नवीन कानूनों को लागू किया! अतः पुलिस एवं सैनिक अधिकारियों के शोषण एवं नयी लगान ब्रिटिश कानून के प्रति और असमझ एवं अविश्वास के कारण जनजातियों ने अनेक विद्रोह किये!  

(3) धार्मिक कारण – 

1813 ई. के चार्टर एक्ट के पश्चात ब्रिटिश सरकार द्वारा ईसाई धर्म प्रचारकों को प्रोत्साहित किया गया! ईसाई मिशनरियों के द्वारा आदिवासियों को जबरन ईसाई धर्म में धर्मांतरित किया जाता था! इस कारण भी जनजातियों ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध विद्रोह किया! 

(4) आर्थिक कारण –

जनजाति विद्रोह का प्रमुख कारण ब्रिटिश आर्थिक नीति को माना जाता है! ब्रिटिश आर्थिक नीति के विरुद्ध मुख्यतः विद्रोह हुए –

(1) आदिवासियों के जीवन में वनों का बड़ा महत्व था! आदिवासी परंपरागत रूप से वनों एवं वन्य संपदा पर अपना अधिकार मानते थे, किंतु ब्रिटिश वन नीति के अंतर्गत वनों को सरकारी संपत्ति घोषित कर दिया गया तथा आदिवासियों को वन संपदा के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया था! अत: जनजातियों ने ब्रिटिश व्यक्ति के विरुद्ध विद्रोह किए! 

(2) ब्रिटिश आबकारी नियमों के अंतर्गत 1822 ई. में चावल से बनने वाली शराब पर तथा 1827 ई. में अफीम पर कर लगा दिया गया, जबकि इन नशीले पदार्थ का उपभोग जनजाति परंपरागत रूप से करते थे! अत: उन्होंने इन कानूनों का विरोध करना प्रारंभ कर दिया! 

जनजातिय विद्रोह का स्वरूप (janjatiya vidroh ka swaroop) – 

मुख्यतः जनजातीय विद्रोह का उद्देश्य स्थानीय समस्याओं के निराकरण तक ही सीमित था, उनका दृष्टिकोण में संकीर्ण था! जनजाति ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का वास्तविक चरित्र नहीं समझ सके!

यही कारण था कि उन्होंने जमीदार व्यवस्था, पुलिस व्यवस्था एवं न्यायपालिका का ही विरोध किया! न कि संपूर्ण ब्रिटिश शासन का! जनजाति विद्रोह मुख्यतः पुरातन व्यवस्था को बनाए रखने एवं नवीन व्यवस्था के विरोध में ही हुए! उनके विरोध का तरीका भी हिंसा एवं बल पर आधारित होता था! 

भारत के प्रमुख जनजातिय विद्रोह (Pramukh janjatiya vidroh) –

1) रमोसी विद्रोह (ramoshi vidroh) –  

पश्चिमी घाट की रमोसी जनजाति अंग्रेजी प्रशासन से नाराज थी! उनके नेता सरदार चित्तर सिंह ने इस विद्रोह का नेतृत्व किया, किंतु अंग्रेजी सेना द्वारा इसे दबा दिया गया

(2) भील विद्रोह (bhil vidroh) – 

पश्चिमी घाट में सेवाराम भील के नेतृत्व में भीलों ने नवीन अंग्रेजी कानून के विरुद्ध विद्रोह किया! माना जाता है कि विद्रोह में भीलो को पेशवा बाजीराव द्वितीय का सहयोग प्राप्त हुआ था, किंतु अंग्रेजी सेना द्वारा इस विद्रोह को भी कुचल दिया गया! 

(3) कोल विद्रोह (kol vidroh) – 

छोटा नागपुर की जनजाति कोल ने चावल की नशीली शराब पर लगाए गए उत्पादन शुल्क के विरोध में बुद्धो भगत एवं गंगा नारायण के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया, किंतु ब्रिटिश सेना द्वारा इसे भी कुचल दिया गया! 

(4) खासी विद्रोह (khasi vidroh) – 

अंग्रेजों ने जयंतिया पहाड़ी के आसपास के क्षेत्रों को जीतने के पश्चात यहां नवीन मार्ग बनवाने के क्रम में खासी जनजातियों को बेगारी करने हेतु बाध्य किया! इसके विरोध में तीरत सिंह के नेतृत्व में खासी जनजाति ने विद्रोह कर दिया किंतु सैन्य बल के द्वारा इसे भी दबा दिया गया! 

5) संथाल विद्रोह (santhal vidroh) – 

बिहार के राजमहल जिले में अत्याधिक भूमि कर एवं पुलिस दमन के विरूद्ध में संथालों ने सिद्भू एवं कान्हू के नेतृत्व में विद्रोह किया, किंतु 1856 ई. तक सिद्भू तथा कान्हू की हत्या कर विद्रोह कुचल दिया गया! 

(6) मुंडा विद्रोह (munda vidroh) –

बिहार के छोटा नागपुर पठार की मुंडा जनजाति ने सामूहिक खेती को प्रतिबंधित किए जाने के विरोध में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में विद्रोह किया! बिरसा ने कहा कि कलयुग खत्म करके सतयुग लाएंगे, किंतु 1900 ई. में बिरसा को गिरफ्तार कर लिया गया तथा शीघ्र ही बिरसा की हैजा के कारण मृत्यु हो गई!

जनजातिय विद्रोह के असफलता के कारण (janjatiya vidroh ke asafalta ke karan) – 

जनजातिय लोगों द्वारा किए गए विभिन्न विद्रोह प्रायः ब्रिटिश सरकार द्वारा सैन्य शक्ति के बल पर कुचल दिए गए थे! वस्तुतः आदिवासी विद्रोह की असफलता के पीछे निम्नलिखित कारणों उत्तरदाई है –

(1) जनजातिय लोगों के पास कोई स्पष्ट उद्देश्य नहीं था तो वह ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध एकजुट होकर संघर्ष नहीं कर पाए! 

(2) जनजातीय लोगों के पास परंपरागत हथियार जैसे – तीर कमान, हंसिया, कुल्हाड़ी आदि थे, जबकि ब्रिटिश सेना के पास आधुनिक हथियार थे! 

(3) जनजातीय लोगों को योग्य नेता का नहीं मिला! जनजातीय लोगों के नेतृत्वकर्ता सिद्द, कान्हू, बिरसा मुंडा आदि स्थानीय लोग ही थे, जबकि अंग्रेजों को प्रशिक्षित एवं योग्य अधिकारियों को सेवाएं प्राप्त हुई! 

जनजातिय विद्रोह के परिणाम या महत्व (Janjatiya vidroh ke parinam mahatva) –

यद्यपि ज्यादा जनजाति विद्रोह को ब्रिटिश सेना द्वारा कुचल दिया गया था किंतु उन विद्रोह के कुछ सकारात्मक परिणाम भी रहे जैसे –

(1)जनजातीयों में एकता और संगठनात्मक प्रवृत्ति का विकास हुआ! 

(2) परंपरागत एवं स्थानीय विद्रोह की परंपरा स्थापित हुई! 

(3) आगे भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जनजातियों का भी विशेष योगदान और सहयोग रहा!

(4) इतिहास लेखन में सबाल्टर्न विचारधारा का विकास हुआ

इन्है भी पढें –

1857 की क्रांति के कारण एवं परिणाम

Leave a Comment

error: Content is protected !!