पृथ्वी का ऊष्मा बजट एवं तापमान का प्रतिलोमन क्या होता है

पृथ्वी का ऊष्मा बजट (Earth’s heat budget in hindi) –

यद्यपि पृथ्वी, सूर्य से लगातार ऊर्जा प्राप्त करती रहती है परंतु पृथ्वी पर तापमान लगातार लगभग स्थिर बना रहता है इसका कारण पृथ्वी द्वारा समान मात्रा में ऊर्जा का प्राप्त करना तथा उसका विकिरण करना है! इस प्रकार पृथ्वी का एक समान मात्रा में सूर्यातप प्राप्त करना और उसका वापस जाना उष्मा संतुलन या उष्मा बजट (heat budget) कहलाता है! 

पृथ्वी उष्मा का न तो संचय करती है न हीं हास करती है परंतु यह अपने तापमान को संतुलित रखने का प्रयास करती है! यह तभी संभव होता है, जब सूर्याताप के रूप में प्राप्त ऊष्मा एवं पार्थिव विकिरण द्वारा परावर्तित उष्मा बराबर हो! सूर्य से जितनी ऊर्जा विकीर्ण होती है, उसका कुछ भाग ही पृथ्वी को प्राप्त हो पाता है, क्योंकि वायुमंडल द्वारा प्रकीर्णन, परावर्तन और अवशोषण के कारण कुछ भाग अंतरिक्ष में लौटा दिया जाता है!

यदि माना जाए कि पृथ्वी के वायुमंडल की ऊपरी सतह पर इकाई ऊर्जा प्राप्त होती है, तो उसमें से 14 इकाई सीधे वायुमंडल द्वारा अवशोषित कर ली जाती है तथा 35 इकाई परिवर्तित हो जाती है! शेष 51 इकाई धरातल द्वारा अवशोषित की जाती है जिससे धरातल गर्म होता है! सौर ऊर्जा के अवशोषण से गर्म होने के पश्चात धरातल  दीर्घ तरंगों के रूप में ऊर्जा का विकिरण करने लगता है! इसे पार्थिव विकिरण कहते हैं!  

इस प्रकार 51 इकाई ऊर्जा पृथ्वी द्वारा वायुमंडल में पार्थिव विकिरण के रूप में छोड़ी जाती है, जिसमें से 34 इकाई वायुमंडल में उपस्थित कार्बन डाई ऑक्साइड और जलवाष्प द्वारा अवशोषित कर ली जाती है और शेष 17 इकाई ऊर्जा पुनः अंतरिक्ष में वापस कर दी जाती है!

इस प्रकार वायुमंडल कुल 48 इकाई ऊर्जा प्राप्त करता है तथा इस सारी ऊर्जा को अंतरिक्ष में विकिरित कर देता है! इस प्रकार कुल 100 यूनिट ऊर्जा की हानि होती है जिसमें पार्थिव विकिरण और वायुमंडल द्वारा किए जाने वाले परावर्तन का भी योगदान है! 

तापमान का प्रतिलोमन या व्युत्क्रमण (Inversion of Temperature in hindi) – 

सामान्यता ऊंचाई पर जाने पर तापमान में गिरावट आती है, किंतु जब कभी तापमान का यह नियम उलट हो जाता है, तो इसे तापमान का प्रतिलोमन (Inversion of Temperature) कहा जाता है! यह दशा धरातल के निकट भी हो सकती है, परंतु अधिक ऊंचाई पर होने वाला तापीय प्रतिलोमन अधिक स्थाई होता है, क्योंकि पार्थिव विकिरण द्वारा ऊपरी गर्म परत को ठंडा करने में अधिक समय लगता है! धरातल के निकट होने वाला प्रतिलोमन अल्पकालिक होता है! 

रूद्भोष्म ताप परिवर्तन (Adiabatic Temperature Change in hindi) – 

जब कोई निश्चित तापमान वाली वायु समुद्र तल से ऊपर उठती है तो कम वायुमंडलीय दाब के कारण उसका आयतन बढ़ जाता है और वह फैलने लगती है! जब यही वायु नीचे उतरती है तो अधिक वायुमंडलीय भार के कारण सिकुड़ती है तथा उसका आयतन घट जाता है! 

इस प्रकार वायु के ऊर्ध्वाधर रूप में ऊपर जाने तथा नीचे आने के कारण बिना उष्मा लिए तापमान में परिवर्तन आ जाता है! अर्थात जब कोई वस्तु न तो बाहरी माध्यम को उष्मा दे और न ही उससे उष्मा ले, परंतु उसका ताप बदल जाए तो इस परिवर्तन को रूद्भोष्म परिवर्तन (Adiabatic temperature change) कहते हैं! रूद्भोष्म परिवर्तन का एकमात्र कारण में परिवर्तन का एकमात्र कारण वायुदाब में परिवर्तन है! 

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