मार्ले मिंटो सुधार 1909 (Marle Minto Sudhar 1909)

मार्ले मिंटो सुधार 1909 (Marle Minto Sudhar 1909 In Hindi) – भारत परिषद अधिनियम 1909 के समय लॉर्ड मार्ले इंग्लैंड में भारत के सचिव थे और लॉर्ड मिंटो भारत में वायसराय थे इसलिए इससे मार्ले मिंटो सुधार (Marle Minto Sudhar 1909) भी कहा जाता है इस सुधार के अंतर्गत निम्न प्रावधान किए गए  मार्ले मिंटो … Read more

भारत शासन अधिनियम 1919 ( Bharat Shasan Adhiniyam 1919 )

bharat shasan adhiniyam 1919

माण्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार 1919 (Bharat Shasan Adhiniyam 1919 in hindi) –

 
वस्तुतः Bharat-shasan-adhiniyam-1919 में 1909 के प्रावधानों को यदि की स्पष्ट एवं व्यापक रूप को प्रदान किया गया इस अधिनियम ने पहली बार भारत में दोहरा शासन और प्रत्यक्ष निर्वाचन की व्यवस्था को प्रारंभ किया!
20 अगस्त 1917 को ब्रिटिश सरकार ने प्रथम बार यह घोषित किया कि उनका उद्देश्य क्रमिक रूप से भारत में  उत्तरदाई सरकार की स्थापना करना था! जिसके लिए  क्रमिक रूप से भारत शासन अधिनियम 1919 (bharat shasan adhiniyam 1919 ) बनाया गया, जो 1921 से लागू हुआ! 
इस समय माण्टेग्यू भारत के राज्य सचिव थे जबकि चेम्सफोर्ड भारत के वायसराय थे, इसलिए इस अधिनियम को माण्टेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार भी कहा जाता है! भारत शासन अधिनियम 1919 के प्रमुख प्रावधान इस प्रकार है –

भारतीय शासन अधिनियम 1919 की प्रमुख विशेषताएं ( bharat shasan adhiniyam 1919)  –

(1) इस अधिनियम के माध्यम से केंद्र में द्विसदनात्मक विधायिका की स्थापना की गई, जिसमें प्रथम राज्य परिषद तथा दूसरी केंद्रीय विधान सभा थी! 
 
(2) Bharat Shasan Adhiniyam 1919 के द्वारा लोगों को वोट देने का अधिकार प्रदान किया गया, परंतु यह अधिकार निष्पक्ष ना होकर शिक्षा, संपत्ति और कर के आधार पर दिया गया! 
 
(3) प्रत्यक्ष निर्वाचन इस व्यवस्था द्वारा प्रांत मे आंशिक कम उत्तरदाई सरकार की स्थापना प्रारंभ हो गई, जिससे भारत में  उत्तरदाई सरकार की अवधारणा का विकास हुआ! 
 
(4) केंद्र और प्रांतों के संबंध में कानून बनाने के विषयों का अधिक स्पष्ट  विभाजन कर दिया गया. प्रांतों को और ज्यादा शक्तियां प्रदान की गई तथा उन पर केंद्र का नियंत्रण कम कर दिया गया! 

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भारत शासन अधिनियम 1935 (Bharat Shasan Adhiniyam 1935 )

  भारतीय शासन अधिनियम 1935 (Bhart Shasan Adhiniyam 1935) – भारत शासन अधिनियम (Bharat Shasan Adhiniyam 1935) भारत के संविधान निर्माण एक मील का पत्थर साबित हुआ! यह एक बहुत विस्तृत दस्तावेज था, जिसमें 10 अनुसूचियां तथा 321 धारा  थी!    भारत शासन अधिनियम 1935 की विशेषताएं (Quality Of Bharat Shasan adhiniyam 1935) – (1) इस … Read more

44 वा संविधान संशोधन(44 va Samvidhan Sansodhan)

 44 va Samvidhan Sansodhan

44 वां संविधान संशोधन (44 va Samvidhan Sansodhan) –

आपातकाल में संकटकालीन प्रावधानों का जिस प्रकार दुरुपयोग किया गया, उससे इन प्रावधानों के विरुद्ध प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक था. इसके अतिरिक्त 1977 में सत्तारूढ़ जनता पार्टी संविधान के संकटकालीन प्रावधानों में ऐसे परिवर्तन के लिए वचनबद्ध थी, जिससे वर्तमान या भविष्य में सरकारों द्वारा इसका दुरुपयोग न किया जा सके.
 
इस संविधान संशोधन द्वारा 42 वें संविधान संशोधन में किए गए अनेक प्रावधानों में संशोधन किया गया. 44 वें संविधान संशोधन (44 va Samvidhan Sansodhan) द्वारा संविधान में किए गए संशोधन इस प्रकार हैं –
 

44 va Samvidhan Sansodhan –

(1) लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को पुनः 6 वर्ष से 5 वर्ष कर दिया गया! 
 
(2)अब आपातकाल युद्ध भारी आक्रमण सशस्त्र विद्रोह अथवा इस प्रकार की आशंका होने पर ही घोषित किया जा सकेगा केवल आंतरिक अशांति के नाम पर आपातकाल घोषित नहीं किया जा सकता! 
 
(3) राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 352 के अंतर्गत आपातकाल की घोषणा तभी की जा सकेगी जब मंत्रिमंडल लिखित रूप से  राष्ट्रपति को ऐसा परामर्श दें! 
 
(4) आपातकाल की घोषणा के 1 माह के अंदर संसद के विशेष बहुमत से इसकी स्वीकृति आवश्यक होगी और इसे लागू रखने के लिए प्रति 6 माह बाद पुनः स्वीकृति आवश्यक होगी! अर्थात एक बार में केवल 6 माह के लिए ही आपातकाल लगाया जा सकता है! 
 
(5) आपातकाल को लोकसभा के साधारण बहुमत द्वारा हटाया जा सकता है तथा राष्ट्रपति द्वारा की गई संकटकालीन घोषणा को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है! 
 
(6) राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया कि वह मंत्रिपरिषद की सलाह को एक बार पुनर्विचार के लिए कह सकता है हालांकि पुनर्विचार के बाद दी गई सलाह को मानने के लिए राष्ट्रपति बाद जो होगा! 

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42 वां सविधान संशोधन (42 va samvidhan sansodhan)

 42 va Samvidhan Sansodhan

42 Constitution Amendment in Hindi ( 42 वां संविधान संशोधन )-

42वां संविधान संशोधन (42 va samvidhan sansodhan) अधिनियम को भारत का लघु संविधान भी कहते हैं, यह एक विवादास्पद संविधान संशोधन है. 42 वां सविधान संशोधन अधिनियम मुख्यतः सरदार स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशों को लागू करने के लिए किया गया था. 

इस बिल को एचआर गोखले ने प्रस्तुत किया था  42 va samvidhan sansodhan  संशोधन के समय इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी. इस संविधान संशोधन अधिनियम में निम्न प्रावधान किए गए थे –

 
(1) 42 va samvidhan sansodhan  संशोधन के द्वारा प्रस्तावना में समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष एवं अखंडता आदि शब्दों को जोड़ा गया! 
 
(2) 42 va samvidhan sansodhan द्वारा संविधान में दस मौलिक कर्तव्य को अनुच्छेद 51-क के अंतर्गत जोड़ा गया! 
 
(3) राज्य के नीति निर्देशक तत्व को मूल अधिकारों पर वरीयता दे दी गई ‘अर्थात’ भाग-4 में उल्लेखित नीति निर्देशक तत्व को लागू करने के लिए बनाए गए किसी कानून को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि, उस कानून से किसी मूल अधिकार का उल्लंघन होता है

  

(4) संविधान संशोधन को न्यायिक जांच से बाहर कर दिया गया अर्थात संसद द्वारा पारित किए गए किसी भी संविधान संशोधन को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती! 
 
(5)इसके द्वारा निर्धारित किया गया कि राष्ट्रपति मंत्रीपरिषद एवं उसके प्रमुख प्रधानमंत्री की सलाह के अनुसार कार्य करेगा
 
(6) राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद द्वारा दी गई सलाह को मानने के लिए बाध्य होगा! 
 
(7) संविधान के भाग 14-क में एक नया अध्याय “प्राधिकरण” जोड़ा गया, जिसके तहत केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ( CAT) तथा राज्य प्रशासनिक अधिकरण(SAT) और अन्य मामलों के लिए प्राधिकरण की व्यवस्था की गई! 

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प्रमुख संविधान संशोधन (Pramukh Samvidhan Sansodhan)

 

प्रमुख संविधान संशोधन ( Pramukh Samvidhan Sansodhan)

 

Constitution Amendment in Hindi (Pramukh Samvidhan Sansodhan)  –

संविधान में संशोधन क्यों किया जाता है –

कानून गतिशील प्रक्रिया होती है ,जिसमें समय के साथ परिवर्तन होता रहता है. इसलिए भारत के सर्वोच्च कानून संविधान में  समयानुसार परिवर्तन किया जाता है! संविधान में संशोधन करके परिस्थिति के अनुकूल कानूनों को बनाया जाता है.जिससे किसी प्रकार का प्रतिरोध उत्पन्न ना हो!
संविधान में किए गए प्रमुख संविधान संशोधन Pramukh Samvidhan Sansodhan इस प्रकार है –

प्रथम संशोधन (1951)  –

प्रथम संशोधन के द्वारा नौवीं अनुसूची को जोड़ा गया, नौवीं अनुसूची में लिखित कानूनों को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती थी! 
 

तीसरा संशोधन 1952 – 

खाद्य पदार्थ के संबंध में केंद्र को शक्तियां प्रदान करना तथा आवश्यक खाद्य पदार्थों को राज्य सूची से निकालकर संघ सूची में शामिल कर दिया गया! 
 

5 वा संशोधन 1955 –

पांचवे संविधान संशोधन के द्वारा राज्य पुनर्गठन के विषय में विधानमंडलों का मत जानने हेतु समय सीमा का निर्धारण करना ! 
 

7 वां संशोधन 1956 –

दूसरी अनुसूची में संशोधन. दो या दो से अधिक राज्यों के लिए एक संयुक्त न्यायालय की व्यवस्था! 
 

9 वां संशोधन 1960 – 

भारतीय भू-भागों के हस्तांतरण की व्यवस्था! 
 

10 वां संशोधन 1961 – 

दादर एवं नगर हवेली को भारत में शामिल कर उन्हें केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया गया!  
 

11 वां संशोधन 1961 – 

राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति के निर्वाचन के संबंध में स्पष्टीकरण 
 

12 वां संशोधन 1962 – 

गोवा दमन और दीव को भारतीय संघ में शामिल किया गया ! 
 

13 वां संशोधन 1962 – 

इस संशोधन के द्वारा नागालैंड के संबंध में विशेष प्रावधान किए गए तथा उसे एक राज्य का दर्जा दिया गया ! 
 

14 वां संशोधन 1962 – 

पांडुचेरी को भारतीय संघ में शामिल किया गया और हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, गोवा, दमन और दीव, पांडुचेरी केंद्र शासित प्रदेशों में विधानसभा और मंत्री परिषद की स्थापना की गई! 
 

17 वां संशोधन 1964 – 

नौवीं अनुसूची के दायरे का विस्तार किया गया तथा राज्यों के कानूनों को भी नौवीं अनुसूची में शामिल किया गया! 
 

18 वां संशोधन 1966 – 

केंद्र शासित प्रदेशों के पुनर्गठन की शक्ति संसद को प्रदान की गई और अनुच्छेद 3 में संशोधन किया गया ! 
 

19 वां संशोधन 1966 – 

उच्च न्यायालय को निर्वाचन संबंधी विवादों के निपटारे की शक्तियां प्रदान करना, इसके पहले शक्ति निर्वाचन आयोग के पास थी! 
 

21 वां संशोधन 1967 –

हिंदी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची के अंतर्गत पंद्रहवी की भाषा के रूप में शामिल किया गया! 

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भारतीय संविधान के भाग (Bhartiya samvidhan ke bhag)

    संविधान के भाग (Bhartiya Samvidhan ke Bhag) –  भारतीय संविधान में विभिन्न अनुच्छेदों को निश्चित क्रम में रखा गया है, जिससे किसी एक विषय की जानकारी एक निश्चित स्थान पर प्राप्त हो, जाए इसलिए संविधान को विभिन्न भागों में बांटा गया है! संविधान निर्माण के समय संविधान में कुल 22 भाग थे, बाद … Read more

भारतीय संविधान की अनुसूचियां (Bhartiya Samvidhan Anusuchiya)

Bhartiya Samvidhan Anusuchiya

संविधान की अनुसूचियां (Schedules of the Constitution Ya Bhartiya Samvidhan Anusuchiya) –

भारतीय संविधान निर्माण के समय संविधान में 8 अनुसूचियां थी, परंतु बाद में कुछ और अनुसूचियों को जोडा गया,वर्तमान में 12 अनुसूचियां हैं  भारतीय संविधान की अनुसूचियाॅं (Bhartiya Samvidhan Anusuchiya) इस प्रकार है-

प्रथम अनुसूची –

संबंद्भ अनुच्छेद – 1,4

प्रथम अनुसूची में भारतीय संघ के घटक 28 राज्य एवं 8 केन्द्र प्रशासित क्षेत्रों का उल्लेख है!

दूसरी अनुसूची –

संबंद्भ अनुच्छेद –  59,65,75,97,125,148,158,164,186,221

 
इस अनुसूची में भारतीय राजव्यवस्था के विभिन्न पदाधिकारियों जैसे – भारत के राष्ट्रपति, राज्यों के राज्यपाल, लोकसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, राज्यसभा के सभापति और उपसभापति, राज्य विधानसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, राज्य विधान परिषद के सभापति और उपसभापति, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक आदि के वेतन, भत्ते, विशेषाधिकार से संबंधित प्रावधान है! 

तीसरी अनुसूची –

संबंद्भ अनुच्छेद – 75,,84,99,124,146,173,188,219

इस अनुसूची में विभिन्न पदाधिकारियों जैसे संघ के मंत्री, संसद के लिए निर्वाचित किए गए अभ्यर्थी, संसद सदस्य, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक,राज्य विधानसभा के लिए निर्वाचित किए गए अभ्यर्थी, राज्य मंत्री, राज्य विधान मंडल के सदस्य, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश आदि द्वारा ली जाने वाली शपथ या प्रतिज्ञान का उल्लेख किया गया है! (Bhartiya Samvidhan Anusuchiya)

चौथी अनुसूची –

संबंद्भ अनुच्छेद – 4, 80.
चतुर्थ अनुसूची में विभिन्न राज्यों तथा केंद्र प्रशासित क्षेत्रों का राज्यसभा में प्रतिनिधित्व का विवरण दिया गया है! 

पांचवी अनुसूची –

संबंद्भ अनुच्छेद – 244.

इस अनुसूची में विभिन्न अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजाति के प्रशासन और नियंत्रण के बारे में उल्लेख किया गया है! 

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प्रधानमंत्री,प्रधानमंत्री के कार्य व शक्तियां लिखिए(Pradhanmantri Shaktiyan aur karya Likhayiye )

Pradhanmantri Shaktiyan

प्रधानमंत्री (Pradhanmantri) –

भारत में संसदीय व्यवस्था को अपनाया गया है जिसमें राष्ट्रपति केवल नाममात्र का कार्यकारी प्रमुख होता है तथा वास्तविक कार्यकारी शक्तियां प्रधानमंत्री में निहित होती है (Pradhanmantri Shaktiyan)
अनुच्छेद 74 के अनुसार राष्ट्रपति पोस्ट के कार्यों के संपादन और सलाह देने हेतु एक मंत्रिपरिषद होती है इसका प्रधान प्रधानमंत्री होता है! 

प्रधानमंत्री की नियुक्ति (Pradhanmantri ki niyukti ) –

संविधान में प्रधानमंत्री का निर्वाचन और नियुक्ति के लिए कोई विशेष प्रक्रिया नहीं दी गई है! अनुच्छेद 75 केवल इतना कहता है कि राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की नियुक्ति करेगा हालांकि इसका अभिप्राय नहीं है, कि राष्ट्रपति किसी व्यक्ति को प्रधानमंत्री नियुक्त करने हेतु स्वतंत्र है
 
सरकार की संसदीय व्यवस्था के अनुसार राष्ट्रपति लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करता है परंतु, यदि लोकसभा में कोई भी दल स्पष्ट बहुमत में न हो तो राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की नियुक्ति अपने व्यक्तिक स्वतंत्र का प्रयोग कर सकता है ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति सामान्यतः सबसे बड़े दल अथवा गठबंधन के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करता है और उसे 1 माह के भीतर सदन में विश्वास मत हासिल करने के लिए कहता है! 

प्रधानमंत्री के कार्य व शक्तियां (Pradhanmantri shaktiyan avam karya  ) –

(A) मंत्री परिषद के संबंध में (Pradhanmantri Shaktiyan Mantriparisad Ke Samband me) –

(1) वह मंत्रियों को विभिन्न मंत्रालय आवंटित करता है और उनमें फेरबदल करता है! 
 
(2) वह मंत्री नियुक्त करने हेतु अपने दल के व्यक्तियों की राष्ट्रपति से सिफारिश करता है, राष्ट्रपति केवल उन्हीं व्यक्तियों को मंत्री नियुक्त कर सकता है जिनकी सिफारिश प्रधानमंत्री द्वारा की जाती है!
 
(3) वह किसी मंत्री को त्यागपत्र देने अथवा राष्ट्रपति को उसे बर्खास्त करने की सलाह दे सकता है! 
 
(4) वह सभी मंत्रियों की गतिविधियों को नियंत्रित, निर्देशित करता है और उनमें समन्वय रखता है
 
(5) वह मंत्रिपरिषद की बैठकों की अध्यक्षता करता है तथा उनके निर्णय को प्रभावित करता है
 
(6) वह पद से त्यागपत्र देकर मंत्रिमंडल को बर्खास्त कर सकता है
 
चूंकि प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद का प्रमुख होता है, अतः प्रधानमंत्री त्यागपत्र देता है अथवा की मृत्यु हो जाती है तो अन्य मंत्री कोई भी कार्य नहीं कर सकते अर्थात मंत्रिपरिषद स्वयं ही घटित हो जाती है और एक शून्यता उत्पन्न ना हो जाती है! (Pradhanmantri Shaktiyan)

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