बलबन का राजत्व सिद्धांत, लौह रक्त नीति और Balban का इतिहास

गयासुद्दीन बलबन का इतिहास (Giasuddin balban history in hindi) –

बलबन (Balban) का वास्तविक नाम बहाउद्दीन था! वह इल्तुतमिश का गुलाम था! बलबन 1266 में गयासुद्दीन बलबन के नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठा! वह मंगोलों के आक्रमण से दिल्ली का रक्षा करने में सफल रहा! बलबन ने राजदरबार में सिजदा एवं पैबोस प्रथा की शुरुआत की थी! बलबन ने भारतीय रीति रिवाज पर आधारित नवरोज उत्सव को प्रारंभ करवाया था! 

बलबन का राजत्व सिद्वांत (Balban ka rajatv sidhant) –

बलबन दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था, जिसने राजत्व संबंधित सिद्धांतों की घोषणा की! इसकी प्रेरणा बलबन को ईरान के शासकों से प्राप्त हुई थी! राजत्व के सिद्धांत से तात्पर्य की सुल्तान की शक्ति का स्त्रोत क्या होगा, सुल्तान किन सिद्धांतों पर प्रजा पर शासन करेगा तथा सुल्तान का अपने अधिकारियों के साथ कैसा संबंध होगा! 

बलबन के राजत्व सिद्वांत के उद्देश्य –

बलबन के राजत्व सिद्धांत की जानकारी इतिहासकार बरनी द्वारा संकलित बलबन की वसीयत से मिलती है! बलबन का राजत्व सिद्धांत निम्नलिखित उददेश्योंं से प्रेरित था! 

(1) तुर्की अमीरों के मध्य सर्वोच्चता स्थापित करना! 

(2) मंगोल आक्रमण का सामना करना!

 (3) राज हत्या के कलंक से मुक्त होना! 

(4) जनता का समर्थन प्राप्त करना!

 (5) आंतरिक विद्रोह से साम्राज्य की सुरक्षा करना आदि! 

बलबन का राजत्व सिद्वांत का आधार – 

बलबन के राजत्व सिद्धांत के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु मुख्यतः प्रतिष्ठा, शक्ति एवं न्याय पर जोर दिया! 

प्रतिष्ठा –

बलबन ने राजपद को नियामत-ए-खुदाई (ईश्वर द्वारा प्रदत्त) कहा तथा जिल्ल-ए- इलाही (ईश्वर का प्रतिबिंब) की उपाधि धारण की! बलबन के अनुसार सुल्तान को ईश्वर से शक्ति प्राप्त होती है! अत: जनसाधारण या तुर्की अमीरों को उसके कार्यों की आलोचना करने का अधिकार नहीं है!

इसी प्रकार बलबन ने खलीफा से अपने पद की स्वीकृति प्राप्त की तथा खलीफा का नाम सिक्कों पर अंकित करवाया! इन प्रयासों के माध्यम से बलबन राजहत्या के कलंक से मुक्त होने का प्रयास किया! 

शक्ति –

बलबन के राजत्व सिद्धांत में शक्ति प्राप्ति हेतु स्वतंत्र सैन्य विभाग दीवाने आरिज का गठन किया! सैन्य शक्ति के बल पर उसने न केवल मंगोल आक्रमण से सल्तनत की सुरक्षा की, बल्कि आंतरिक विद्रोह को भी कुचलने में सफल रहा! बलबन ने गुप्तचर व्यवस्था का संगठन कर विद्रोहियों की जानकारी प्राप्त की तथा मेवातियों एवं राजपूतों के विद्रोह को कुचलने हेतु रक्त एवं लौह की नीति अपनाई! 

न्याय – 

इसके अतिरिक्त बलबन ने राजत्व सिद्धांत में न्याय पर अत्यधिक बल दिया ताकि वह कठोर एवं धनात्मक शासन हेतु जनता का समर्थन प्राप्त कर सके उसने न्याय सिद्धांत में किसी भी व्यक्ति के

बलबन का राजत्व सिद्वांत की सीमाएँ – 

इस प्रकार बलबन का राजत्व सिद्धांत प्रतिष्ठा, शक्ति एवं न्याय पर आधारित था, किंतु उसके राजत्व सिद्धांत की कुछ सीमाएं भी थी! 

(1) बलबन ने साम्राज्य विस्तार करने हेतु कोई प्रयास नहीं किए! 

(2) बलबन ने रक्त की शुद्धता पर अत्याधिक बल दिया तथा तुर्क अमीरों को ही महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर नियुक्त किया! जिससे निम्न जाति के कुछ योग्य मुसलमानों की सेवाएं राज्यों को प्राप्त नहीं हो सकी! 

(3) बलबन ने अपने राजत्व कितनी देर सिद्धांत में क्रूरता एवं हत्या पर अत्यधिक बल दिया, प्रतिक्रियास्वरूप बलबन की मृत्यु के पश्चात शीघ्र ही उसके राजवंश का पतन हो गया! 

बलबन का राजत्व सिद्वांत का मूल्यांकन (balban ke rajatv sidhant ka mulyankan) – 

इन सीमाओं के बावजूद बलबन के राजत्व सिद्धांत का व्यापक महत्व था! उसने न केवल सुल्तानों की धूमिल हो चुकी प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित किया, बल्कि अब आंतरिक विद्रोह एवं मंगोल आक्रमण से भी सल्तनत सुरक्षा की! वस्तुत:  बलबन ने ही दिल्ली सल्तनत का एक मजबूत एवं सुरक्षित आधार निर्मित किया, इस पर आगे अलाउद्दीन खिलजी द्वारा साम्राज्य का विस्तार किया जा सका!  

बलबन की लौह रक्त नीति (balban ki loh rakt niti) –

बलबन ने अपने शत्रुओं के प्रति कठोर लौह रक्त नीति का पालन किया! वह अपने विपक्षियों और विरोधियों का, क्रुरता के साथ दमन करने में विश्वास रखता था! बलबन ने मलिक बकबक और हैवात खान का दमन इसी प्रकार किया! जिसके कारण कोई भी सरदार भविष्य में उपद्रव या विद्रोह करने का साहस न कर सका

बलबन के कार्य (balban ke karya)-

(1) ताज की शक्ति तथा प्रतिष्ठा में वृद्धि –

इतिहासकार बरनी ने लिखा है, नसीरुद्दीन के अंतिम दिनों का सुल्तान की प्रतिष्ठा नष्ट हो चुकी थी! प्रजा के हदय में न उसका भय न ही उसके प्रति श्रद्धा! बलबन ने सर्वप्रथम इस दुर्दशा का अंत करने तथा ताज की शक्ति और प्रतिष्ठा की स्थापना करने का निश्चय किया! गद्दी पर बैठते ही उसने लोगों से मिलना जुलना छोड़ दिया! 

बहुत शान शौकत से रहना प्रारंभ किया! उसने सुल्तान के चरण छूने की प्रथा जारी की! दरबार में शराब आदि पीकर जाने तथा हंसने पर प्रतिबंध लगा दिया! उसने साधारण लोगों तथा नीचे दर्जे के अमीरों से भी बातचीत करना बंद कर दिया! दरबारी वैभव की तड़क-भड़क बढ़ाने के लिए उसने प्रतिवर्ष जाने त्यौहार नौरोज को बनाने का आरंभ किया! इस प्रकार बलबन ने लोगों के हृदय में ताज की प्रतिष्ठा पुनः स्थापित की

बलबन के कार्य का मूल्यांकन कीजिए (Balban ka mulyankan kijiye) –

बलबन के राज्य काल को मजबूत शासन का काल माना जाता है इस समय तुर्क दास कुलीनो अर्थात चहलगानी की कमर तोड़ दी गई तथा सुल्तान की शक्ति और सत्ता को स्थायित्व प्राप्त हुआ! सिंधु-गंगा के दोआब में, जो सल्तनत का केंद्र भाग था, विद्रोही और अन्य तत्व को सख्ती से कुचला गया तथा व्यापारी, माल और सौदागरों की आवाजाही के लिए सड़क के उनसे मुक्त करा ली गई! 

बलबन ने प्रशासन की मौजूदा शासन प्रणाली को पुर्नगठित करने का कोई सुव्यवस्थित प्रयास नहीं किया, खासकर प्रांतीय या स्थानीय स्तर पर! ये क्षेत्र इक्तादारों के नियंत्रण में ही रहे! लेकिन बरीदों अर्थात जासूसों की सहायता से उसने उन पर राजनीतिक एवं वित्तीय नियंत्रण बढ़ाने की कोशिश अवश्य की थी! 

इस बात की भी कोशिश की गई कि प्रशासन और सेना का खर्च निपटाने के बाद इक्तादार अतिरिक्त राजस्व केंद्र को भेजे! बलबन ने इस धन का उपयोग भारी तड़क-भड़क वाले दरबार लगाने और बड़ी केंद्रीय सेना बनाने के लिए किया! 

बलबन ने उच्च पदों पर तुर्कों के एकाधिकार को जारी रखने और उसे मजबूत बनाने की कोशिश की! इसमें उससे मध्य एशिया से, वहां मंगोलों के हमलों के बाद, आने वाले शासकों और उनके नातेदारों, यशस्वी लोगों और विद्वानों से सहायता मिली! लेकिन उसके नस्ली और कबीलाई विशेष अधिकार को बढ़ावा देने तथा तुर्क कुलीनों के प्रभुत्व को जारी रखने के प्रयास स्वाभाविक तौर पर असफल हो गए! 

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